साहित्य

यादें

सुषमा श्रीवास्तव

सम्बल, यादें ही हैं कम्बल

ओढ़ लो,बिछा लो,फिर भी नहीं चुकती यादें।

कितनी भूली-बिसरी यादें, मौका पा अंकुरित होती यादें।

जीवन का हर लम्हा-लम्हा गुलज़ार इन्हीं यादों से,

सहेजने-समेटने की नहीं ज़रूरत,

खुद-ब-खुद जातीं सिमट,

मन-मस्तिष्क ही स्मृति-कुंज है,

रहती हरदम आबाद जहाँ यादें।

जीवन का हर रंग भरा इनमें,

कैसे घुल-मिल कर रहती यादें,

भेद-भाव न बरतें यादें।

जितने भाव औ रंग हैं जीवन के,

उतने ही रूप-रंग आकार-प्रकार की यादें।

अनगिनत-असंख्य होती हैं यादें,

मुकुलित-सुरभित-पुष्पित यादें।

सीख सको तो सीख लो इनसे,

प्रेम-सौहार्द का बीज लो इनसे,

आपस का सामंजस्य है अद्भुत,

श्वासों के अन्तिम पल तक, अवसर की राह तकती हैं यादें।।

 

रचनाकार –

 

सुषमा श्रीवास्तव, मौलिक सृजन, सद्यः निःसृत,©®, रूद्रपुर, ऊधम सिंह नगर, उत्तराखंड।

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Check Also
Close
Back to top button
error: Content is protected !!