
बतलाया जा रहा है कि योग का बाजार फिलहाल 138 अरब डालर का है।यह सन् 2033 ईस्वी तक 250 अरब डालर का हो जायेगा। इतने बड़े बाजार में भारत की भागीदारी सिर्फ 5 प्रतिशत के आसपास है। किसी भी विद्या को सजा संवारकर प्रस्तुत करके उसे व्यापार बना देने में यूरोपीय और अमरीकी लोग माहिर हैं। भारत के बाबा, स्वामी, संन्यासी और योगाचार्यों की नजर योग को व्यापार बना देने पर लगी हुई है। कोई योग करे या न करे,बस सुबह-शाम योगा मैट,अंग दिखाऊ कपड़े और पीने के पानी की बोतल आदि के साथ खुद को किसी न किसी योग केंद्र या योगाश्रम में दिखाना ही है।बस कुछ उल्टी- सीधी वार्म अप की क्रियाओं को किया, आसनों के नाम पर शरीर को तोडा -मरोड़ा,प्राणायाम के नाम पर गहरे श्वास लिये और भंवरे आदि की आवाज के साथ हुं हां की और हो गया योगाभ्यास।न कोई अनुशासन,न कोई संयम, न कोई होश,न कोई शास्त्रीय योगाभ्यास तथा न ही कोई सात्विक आहार- विहार। ढंग से शास्त्रीय योगाभ्यास करवाकर देख लेना – अधिकांश मैटधारी,लोवरधारी,बोतलधारी योग साधक बीच में छोड़कर भाग जायेंगे और दोबारा वहां पर कभी नहीं आयेंगे। 21 जून अंतरराष्ट्रीय योग दिवस पूरी तरह से राजनीतिक कार्यक्रम बन चुका है।इसे भारत में तो राष्ट्रीय राजनीति दिवस या राष्ट्रीय रैली दिवस घोषित कर दिया जाना चाहिये।योग और योगाभ्यास की आड़ में जनमानस को बेवकूफ बनाया जा रहा है।कुछ भी अनैतिक करके स्वयं को सही और बाकी सभी को गलत सिद्ध करना – यह योग नहीं अपितु उन्मुक्त भोग है। धर्म, संस्कृति,अध्यात्म, साधना, आयुर्वेद,योग,तीर्थस्थल, पूजा-पाठ,गाय, गंगा, गायत्री, गीता,गणेश,गणवेश आदि सभी को घटिया राजनीति का माध्यम बनाया जा रहा है। और नहीं तो केवल ‘योग’ को तो छोड़ देते। अपनी लूटेरी और भ्रष्ट राजनीति से योग को तो दूर रखते। लेकिन नहीं इसमें भी राजनीति को घुसेड़ दिया गया है।लोग सुबह-सुबह योगाभ्यास करने के लिये बुलाये गये और शुरू हो गई राजनीतिक भाषणबाजी।आज अनेक जगहों पर इस धींगामुश्ती के फलस्वरूप लोगों ने खूब अफ़रा-तफ़री मचाई है। आज के योगाभ्यास में ‘यम’ के अंतर्गत मौजूद ‘सामाजिक अनुशासन’ के रूप में अहिंसा,सत्य, अस्तेय,ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह कहीं भी दिखाई नहीं दे रहे थे। और ‘नियम’ के अंतर्गत मौजूद शौच, संतोष, तप ,स्वाध्याय ईश्वरप्रणिधान रुपी व्यक्तिगत अनुशासन की धज्जियां उड़ती हुई देखी जा रही हैं। योगाभ्यास के विभिन्न मंचों पर राजनीतिक रुप से सर्वोच्चता ग्रंथि के मनोरोगियों का कब्जा हर कहीं पर देखा गया है। शारीरिक रूप से बिमार बड़ी- बड़ी तोंद निकले,कमर की जगह पर कमरा लिये तथा चश्मे लगाये हुये तथा मरियल से चलने में अशक्त लोग अधिकांशतः जनमानस को योगाभ्यास का महत्व बतलाते हुये दिखाई दे रहे हैं।
2.)तथाकथित बड़े -बड़े योगाचार्य भी इस मूढ़ता पर चुप्पी साधे बैठे हैं कि 30-35 हजार लोगों की रैलीनूमा भीड़ के साथ योगाभ्यास नहीं होता है।इतनी भीड़ तो एक साथ कोई व्यायाम भी सही ढंग से नहीं कर सकती है, योगाभ्यास तो बहुत दूर की बात है। लेकिन यह मूढ़ता योगाभ्यास की आड़ लेकर चल रही है।या तो इन तथाकथित योगाचार्यों को योग विद्या का क ख ग भी नहीं आता है या फिर पद, प्रतिष्ठा और पैसे के लालच में ये जानबूझकर कुछ नहीं बोल रहे हैं। इनमें से एक बात तो सच अवश्य है। किसी प्रकार का हल्का व्यायाम या सूक्ष्म क्रियाएं या वार्म भी भीड़ में भलि तरह से नहीं होता है। क्योंकि एक तो अफरातफरी में गलत ठीक करने का ध्यान नहीं रहता है। दूसरे कोई यदि गलत कर रहा है है तो प्रशिक्षकों का हरेक व्यक्ति पर ध्यान दिया जाना असंभव है। तीसरा इस तरह की भीड़-भाड़ में हरेक व्यक्ति दिखावा करने के भाव से बैठा हुआ होता है। एकांत,चित्तवृत्ति निरोध, स्वच्छ परिवेश,खुला आसमान,धूल- धुवां रहित स्थान आदि का इसमें कोई ख्याल नहीं होता है।इस प्रकार के आयोजन राजनीतिक और व्यापारिक होते हैं।इनका योगाभ्यास से कोई मतलब नहीं होता।एक उच्च कोटि की विद्या को किस तरह से उसके ही लोगों द्वारा विकृत किया जाता है,उसका यह उदाहरण सामने है।
3.)योगाभ्यास एकांत और शांत स्थान पर विराजमान होकर किया जाता लेकिन आजकल के योगाचार्य भीड़-भाड़,हो -हल्ले,चिल्ल -पों और शोर-शराबे में योगाभ्यास करना और करवाना आवश्यक समझते हैं। सही बात तो यह है कि इन्हें योगाभ्यास से कोई मतलब नहीं होता है। इनको तो कुछ भी करके पद, प्रतिष्ठा, प्रसिद्धि, फोटोशूट और धन- दौलत चाहिये। एकांत और शांत परिवेश में शांति तो मिल जायेगी लेकिन पद, प्रतिष्ठा आदि नहीं मिल सकते।एक साधारण योग -साधक से लेकर राजा तक योगाभ्यास की आड़ में फोटोशूट करवाने में लगे रहते हैं।यह योगाभ्यास की अवन्नति, गिरावट और पतन का काल चल रहा है।मोटे रुपये लेकर विश्वविद्यालयों,योग केंद्रों और योगाश्रमों तक में आनलाईन योगाभ्यास करवाया जा रहा है और धड़ल्ले से तक इंटर्नशिप करवाई जा रही हैं।
4.)वैज्ञानिक पिछले 300 वर्षों से कहते आ रहे हैं कि विज्ञान के अनुसार जीवन जीओ,यह धरती स्वर्ग बन जायेगी। अपने जीवन में विज्ञान और वैज्ञानिक खोज से प्राप्त तकनीक का प्रयोग करो, जीवन खुशहाल बन जाएगा। वैज्ञानिक ढंग से चिकित्सकों के बतलाये अनुसार आहार ग्रहण करो, कभी बिमार नहीं होओगे। वैज्ञानिक ढंग से शिक्षा ग्रहण करो, बेरोजगार नहीं रहोगे। वैज्ञानिक ढंग से वस्त्र धारण करो,निरोग रहोगे।बिमार होने पर जीवन रक्षक एलोपैथिक दवाईयों, विभिन्न जांच, महंगे चिकित्सकों और मल्टी विटामिन आदि की शरण में जाओ। परमात्मा भी आपका कुछ नहीं बिगाड़ पायेगा। विज्ञान, वैज्ञानिक, वैज्ञानिक मशीनरी, वैज्ञानिक जांच- पड़ताल, वैज्ञानिक जीवन-शैली को अपने जीवन में उतार लो। इससे आप एक उच्च स्तरीय जीवन जीने में सफल होओगे। लेकिन ऐसा तो कुछ भी नहीं हुआ है। जितना विकास हुआ, उतना ही चहुंओर विध्वंस दिखाई दे रहा है।जीवन के हरेक स्तर पर अव्यवस्था मौजूद है। भेदभाव और भ्रष्टाचार चरम है। तीन चौथाई विश्व के लोग अशिक्षा,भूखमरी, बेरोजगारी,अन्याय, बिमारियों और आतंक से जूझ रहे हैं। विज्ञान ने सुविधाएं देकर विश्व का अमन,चैन और भाईचारा छीन लिया है।
5.)धर्म विज्ञान अनुसार हो तथा विज्ञान धर्मानुसार हो-इस पर न तो वैज्ञानिक सहमत हैं तथा न ही धर्माचार्य सहमत हैं। दोनों का धंधा खतरे में पड़ जाता है।इस समय वैज्ञानिकों का पलड़ा भारी है और धर्मगुरुओं का पलड़ा हल्का है।इसीलिये सभी धर्माचार्य स्वयं के विचारों, विश्वासों, धारणाओं, कर्मकांडों और मान्यताओं को वैज्ञानिक सिद्ध करने में लगे रहते हैं।इनकी इतनी हिम्मत नहीं है कि ये वैज्ञानिकों से यह कहने की हिम्मत कर सकें कि विज्ञान को भी धार्मिक और आध्यात्मिक होना चाहिये। आखिर धर्म को ही वैज्ञानिक क्यों होना चाहिये? विज्ञान को भी तो धार्मिक और आध्यात्मिक होने की हिम्मत करना चाहिये। लेकिन इस विषय में दोनों ही पक्ष धूर्तता से कार्य कर रहे हैं। दोनों को अपने धंधे की चिंता है। यहां पर मौजूद जनमानस, पशुओं,पक्षियों, पेड़-पौधों, नदियों, तालाबों, झीलों, समुद्रों, पहाड़ों, जंगलों से दोनों में से किसी को कोई लेना-देना नहीं है।
6.)सफलता का कोई निश्चित फार्मूला नहीं होता है। हालांकि जिनको अपने स्वयं की धारणाओं को दूसरों पर थोपने की जिद्द होती है, वो सभी सफलता के निश्चित और अचूक फार्मूले बतलाते हुये मिलेंगे। धर्माचार्य, गुरु,संत,मोटीवेशनल स्पिकर,शिक्षक और नेता आदि सभी इस प्रकार के फार्मूले बतलाते हुये मिल जायेंगे। लेकिन हकीकत की जांच करने पर उपरोक्त सभी गलत सिद्ध होते हुये पाये जाते हैं। सफलता के अचूक फार्मूले बतलाते हुये प्रतिभा, पुरुषार्थ, अनुशासन,संयम, धैर्य, समर्पण, निष्ठा आदि का गुणगान किया जाता है। लेकिन कोई लिखकर नहीं दे सकता है कि इनका पालन करने से सफलता मिल ही जायेगी। करोड़ों लोगों में उपरोक्त गुणों के होते हुये भी वो बुरी तरह से विफल होते हुये देखे जा सकते हैं। करोड़ों लोग ऐसे मिल जायेंगे जिनमें उपरोक्त गुण नहीं होते हुये भी उन्हें सफल होते हुये देखा जा सकता है।यदि सफलता का कोई निश्चित फार्मूला होता तो सभी उसे अप्लाई करते और पूरे संसार का हरेक व्यक्ति सफल होकर खुशहाल जीवन जीता। लेकिन ऐसा कहीं हो नहीं रहा है। पिछले 250-300 वर्षों से विज्ञान भी सुखी, समृद्ध और खुशहाल होने के अचूक फार्मूले बतलाता आ रहा है लेकिन परिणाम हम सबके सामने विषमता, बेरोजगारी, बदहाली, अन्याय, अत्याचार, भ्रष्टाचार, हिंसा, तनाव, हताशा और युद्धों के रूप में मौजूद है। जब वैज्ञानिकों से जवाब मांगा जाता है तो वो आगबबूला होकर रुढ़िवादी और पिछड़ा हुआ होने के आरोप लगाकर चुप करवाने का प्रयास करते हैं।
7.)पाश्चात्य किस्म की लोकतांत्रिक व्यवस्था में राजनीतिक और प्रशासनिक सिस्टम शायद कभी मेहनतकश और सत्यनिष्ठ व्यक्ति के साथ सहयोग करके आगे बढ़ता होगा। सिस्टम कमोबेश ऐसा ही होता आया है।जनमानस पर कभी कम अत्याचार और कभी अधिक अत्याचार। जनमानस को सुरक्षा, रोजगार, शिक्षा, चिकित्सा,आवास, सड़क,पानी आदि मूलभूत सुविधाएं देने का वायदा करके सिस्टम जनमानस से कयी प्रकार के
महंगे टैक्स की उगाही करता है। लेकिन भ्रष्टाचार में लिप्त सिस्टम उस टैक्स के बदले जनमानस को एक प्रतिशत भी सुविधाएं प्रदान नहीं करता है। जनमानस से उगाही किये गये टैक्स का अधिकांश हिस्सा नेताओं, नेताओं के समीपवर्ती मित्रों, पूंजीपतियों,कोरपोरेट घरानों, उच्च अधिकारियों और न्यायविदों की अय्याशी पर खर्च होता है। जनमानस यदि आवाज उठाये या प्रश्न करे तो भ्रष्ट सिस्टम तानाशाही से उसका मुंह बंद कर देता है। इससे सैकड़ों गुना अच्छा सिस्टम तो पुराने भारतवर्ष का राजतांत्रिक सिस्टम था, जिसमें हजारों वर्षों तक भारत वास्तव में विश्वगुरु और विश्व महाशक्ति बना रहा था।
8.)वास्तविकता यह है कि विभिन्न प्रकार के मोटीवेशनल स्पिकर, गुरु, सुधारक आदि के चक्कर में पड़कर अपना जीवन बर्बाद मत करें। सफलता का कोई निश्चित और अचूक सूत्र न तो किसी के पास पहले था तथा न ही अब है।यह होने से वह निश्चित रूप से हो जायेगा तथा यह कर्म करने से निश्चित रूप से वह फल मिल जायेगा – यह बहुत बड़ा झूठ है।ऐसी शिक्षाओं और ऐसे शिक्षकों से सावधान रहें। ऐसे लोग स्वयं अपने जीवन में उन फार्मूलों को अपनाकर कभी सफलता प्राप्त नहीं कर पाये,जिन फार्मूलों को वो आपको बतला रहे हैं। ऐसे लोगों की सफलता आपको बेवकूफ बनाकर,अपने व्याख्यान सुनाकर,मोटीवेशन के बदले महंगी फीस वसूली करके और जनमानस को पुस्तकें बेचकर अर्जित की गई दौलत पर निर्भर है। बड़े शहरों में इन लूटेरों ने कोचिंग सेंटर रुपी भव्य आश्रम खोले हुये होते हैं।एक बहुत बड़ा धंधा है।यह लाखों करोड़ का बिजनेस है।
9.)जड़ प्रकृति में जिस तरह से कारणकार्य का वाद काम करता है,वह जनमानस के जीवन में बिल्कुल काम नहीं करता है।जिस प्रकार से प्रकृति के जड़ नियम काम करते हैं, ठीक उसी तरह से राजनीतिक -प्रशासनिक- विधिक-शैक्षणिक सिस्टम काम नहीं करता है। यहां पर कोई कारणकार्य नियम नहीं होता है। यहां पर तो धींगामुश्ती, तानाशाही,जोराजोरी, पहुंच, सिफारिश, रिश्वत, चापलूसी आदि का साम्राज्य रहता है। यहां कर्मफल का नियम बिल्कुल काम नहीं करता है।बस, भ्रष्ट सिस्टम द्वारा जनमानस को आजीवन चलने वाली यह ठगी समझ में आने से रोका जाता है। ताकि सिस्टम का भांडाफोड न हो जाये। ताकि जनमानस जाग न जाये। धर्माचार्य, नेता, कथाकार,शिक्षक, सुधारक आदि जनमानस को दिन -रात कर्म, पुरुषार्थ, मेहनत, प्रतिभा, बुद्धिमत्ता, सत्यनिष्ठा का महत्व समझाते रहते हैं और स्वयं कभी भी इस रास्ते पर नहीं चलते हैं। क्यों? क्योंकि इनको पता है कि राजनीतिक- प्रशासनिक -विधिक सिस्टम में उपरोक्त सात्विक गुण कभी काम नहीं करते हैं। यहां तो सदैव धींगामुश्ती, तानाशाही, अपराध, बेईमानी, भ्रष्टाचरण ही सफलता की कूंजी होता है।
10.)बुद्धिमान,चित्तवान, विवेकवान व्यक्ति किस समय पर क्या प्रतिक्रिया देगा,यह किसी को मालूम नहीं है।इस संबंध में कुछ भी पूर्व -निर्धारित और पूर्वनिश्चित नहीं है। परस्पर व्यवहार करने वाले व्यक्ति प्रकृति की तरह जड़ और निर्जीव नहीं हैं।किस कर्म के प्रति वो क्या प्रतिक्रिया देंगे,इस संबंध में कुछ भी नहीं कहा जा सकता है।इस संदर्भ में बौद्ध मत से पहले मौजूद अनिश्चयवादी विचारकों संजय वेलट्टिपुत्त आदि की याद आती है।सोच,विचार और चिंतन करके कार्य करने वाले मनुष्य समाज और इन द्वारा निर्मित संगठनों में कर्म और कर्म का फल बिल्कुल भी निश्चित नहीं है। राजसत्ता, धनसत्ता,धर्मसत्ता, विधिकसत्ता के अनुचित हस्तक्षेप से कुछ भी होना संभव है। इसलिये तथाकथित महापुरुषों की चिकनी चुपड़ी बातों में आकर अपना जीवन बर्बाद और गुलाम मत करें। भ्रष्टाचरण और अपराध से लबालब भरे हुये मौजूदा राजनीतिक -प्रशासनिक- विधिक सिस्टम में यह आपको निर्धारित करना है कि आप कर्म और कर्मफल में किस तरह से सामंजस्य बनाते हैं। यहां पर साम,दाम,दण्ड,भेद आदि सब चलता है।
11.) किसी मजहब, राजनीतिक दल, संगठन में सम्मिलित होने से जनमानस की समस्यायों के समाधान की बात बिल्कुल झूठी सिद्ध हो चुकी है। हिंदू, बौद्ध,जैन,ईसाई, इस्लामी,सिख,नव बौद्ध,सेक्यूलर, संघ,साम्यवादी आदि मत और कांग्रेस, भाजपा,सपा, बसपा,आआपा, डीएमके, जेडीयू आदि राजनीतिक दलों का हाल भारतीयों ने पिछले पचहत्तर वर्षों के दौरान देख लिया है। कमोबेश सभी लूटेरे,शोषक और भ्रष्टाचारी सिद्ध हुये हैं।इन सभी ने कभी न कभी दावे किये थे कि यदि हमारे साथ रहोगे तो तुम्हारी सभी समस्याओं का समाधान हो जायेगा। लेकिन परिणाम लगभग शून्य हैं। विभिन्न मजहबों ने समानता, भाईचारा,सह अस्तित्व,प्रेम, करुणा की बातें करके मतांतरण करवाये लेकिन बदले में हिंसा,वैमनस्य,द्वेष,भेदभाव आदि ही दिये। विभिन्न राजनीतिक दलों ने विकास,समृद्धि,न्याय, सुविधाएं देने के बदले में गरीबी, बदहाली, अव्यवस्था,अन्याय और शोषण ही दिये हैं।सभी के किये हुये वायदे झूठे निकले हैं।इस धरा का वर्तमान और भविष्य सनातन धर्म और संस्कृति के मार्गदर्शन और आचरण में निहित है। सार्वभौमिक और सार्वकालिक नैतिकता,आचरण,जीवन-मूल्य आदि सनातन धर्म और संस्कृति में मौजूद हैं। पिछले चार हजार वर्षों के कालखंड में विभिन्न मजहबों ने जो वायदे करके सनातनियों को अपने अपने मतों में दीक्षित किया था,वो सभी वायदे झूठे सिद्ध हो चुके हैं।
पिछले चार हजार वर्षों के दौरान विभिन्न राजनीतिक दलों और मजहबों के आपसी झगड़ों और युद्धों में 100 करोड़ के आसपास लोग मारे जा चुके हैं। इनमें सर्वाधिक संख्या सनातनियों की है। इस दौरान पैंतीस करोड़ सनातनी मारे जा चुके हैं। उपरोक्त आंकड़े विभिन्न गुरुओं और मजहबों, नेताओं और राजनीतिक दलों की वास्तविकता उजागर कर रहे हैं।
12.)संसार में सब कुछ अनिश्चित है। संसार में सब कुछ पूर्वनिश्चित है। संसार में कुछ अनिश्चित है तथा कुछ पूर्वनिश्चित है। संसार में अनिश्चित और पूर्वनिश्चित के संबंध में कुछ भी नहीं कहा जा सकता है। अपने आपको कोई संसारी कहता हो या वानप्रस्थी कहता हो या फिर संन्यासी कहता हो-सबके जीवन में इस प्रकार के प्रश्न उठते रहते हैं।इन प्रश्नों की ओर ध्यान नहीं दे पाते हैं -यह इसका एक अलग पहलू है। सभी लोग विचारक या चिंतक या तार्किक किस्म के नहीं होते हैं, इसलिये यह सब होता है। जीवन की समस्यायों, आपाधापी और आवश्यकताओं में उलझकर लोग उपरोक्त समस्या पर एक विचारक या दार्शनिक की तरह सोच नहीं पाते हैं।ये प्रश्न उठते सबके जीवन में हैं। सभी लोगों में इतनी सहनशक्ति और धैर्य नहीं होते हैं कि जीवन की समस्यायों से घिरे होकर भी उनके तार्किक ढंग से वैचारिक और दार्शनिक चिंतन कर सकें।लोग सफलता पाने के लिये प्रयास करते हैं। वो कभी सफल होते हैं तथा अधिकांशतः विफल होते हैं। पूर्वजों द्वारा बतलाई गई बातों, पूर्वजन्म के संस्कारों तथा पुरोहितों-संन्यासियों -स्वामियों -कथाकारों की बातों को सुन -सुनकर भरोसा कर लिया जाता है कि पिछले जन्मों या इस जन्म के किये अच्छे या बुरे कर्मों के कारण जीवन में ऐसा ही होता है। और लगभग व्यक्तियों का जीवन इसी परिपाटी पर चलता रहता है।इन प्रश्नों पर जो व्यक्ति तार्किक ढंग से सोच, विचार और चिंतन करना शुरू कर देता है,वह बहुत अधिक परेशान हो जाता है।उसकी परेशानियां उसे जीवन और जगत् के प्रति निराशावादी, आशावादी, संदेहवादी और संशयवादी बनाने में सहायक होती हैं।इन परेशानियों से उत्पन्न हताशा,कुंठा,तनाव, चिंता और अकेलेपन के दबाव को सहन करने की शक्ति कुछ ही लोगों में होती है। ऐसे लोग ही आगे चलकर महान चिंतक,विचारक,दार्शनिक, वैज्ञानिक और संन्यासी बनते हैं।
13.) निकम्मे,नाकारा और शोषक सिस्टम की यही पहचान होती है कि वह जनता से धन वसुलने के लिये बिजली के स्मार्ट मीटर,टोल टैक्स के लिये स्मार्ट फास्ट टैग पूरे देश में लगवा देगा लेकिन शिक्षा देने के लिये स्मार्ट स्कूल,खेलो के लिये स्मार्ट अकेडमी, किसानों को फसलों के पूरे दाम,मौसम की जानकारी, बीज प्रबंधन और फसल बिक्री देने के लिये स्मार्ट व्यवस्था नहीं करेगा।बिमार लोगों के लिये स्मार्ट हस्पताल खोलने की इन्हें फुर्सत नहीं है। रोड़ टैक्स और टोल टैक्स स्मार्ट व्यवस्था से भरपूर वसूली कर लेंगे लेकिन सड़क निर्माण की कोई स्मार्ट व्यवस्था नहीं है। टिकट देकर रुपये लेने की स्मार्ट व्यवस्था है लेकिन रेलवे में सुविधाओं की कोई स्मार्ट व्यवस्था नहीं है। शोधकर्ताओं से मोटी- मोटी फीस वसूली कर लेंगे लेंगे शिक्षा में शोध की कोई स्मार्ट व्यवस्था नहीं है। महंगी फीस भरकर शिक्षा प्राप्त कर ली लेकिन रोजगार देने की कोई स्मार्ट व्यवस्था नहीं है।कहने का आशय यह है कि जनता का खून चूसने की स्मार्ट व्यवस्था मौजूद हैं लेकिन सुविधाएं देने के नाम पर हमारा सिस्टम पूरी तरह से फिसड्डी सिद्ध हो रहा है।
14.) जड़ संसार की क्रियाओं को छोड़कर संसार में कुछ भी ऐसा है कि जिसके संबंध में यह कहा जा सके कि यह करने से यह फल अवश्य मिल जायेगा? कोई भी वैज्ञानिक,धर्मगुरु, सुधारक, योगाचार्य आदि इसका निश्चित दावा कर सकता है? फलां विश्वविद्यालय से पढ़ाई करने या फलां कोचिंग सेंटर से प्रतियोगिता की तैयारी करने से नौकरी हर हालत में मिल ही जायेगी,इसकी गारंटी कोई ले सकता है? फलां फलां भोजन ग्रहण करने से व्यक्ति कभी बिमार नहीं होगा,इसका दावा कोई चिकित्सक या भोजन विशेषज्ञ कर सकता है? फलां फलां योगाभ्यास करने से व्यक्ति को मानसिक शांति मिल ही जायेगी, क्या कोई योगाचार्य इसका दावा कर सकता है? फलां फलां ढंग से औलाद का पालन पोषण करने से वह बिगड़ेगी नहीं,ऐसी विधि कोई बतला सकता है? उपरोक्त प्रश्नों का उत्तर नहीं में ही होगा, हां में नहीं। निश्चित रूप से कोई कुछ भी उत्तर नहीं दे सकता तथा न ही कोई दावा कर सकता। जड़ जगत् में कुछ तो निश्चितता है लेकिन चेतन प्राणियों और उन द्वारा किये गये कर्मों के फल के संबंध में जगत् में कुछ भी निर्धारित या निश्चित नहीं है।कुछ भी परिणाम आ सकता है।हर परिणाम के लिये व्यक्ति को तैयार रहना चाहिये। श्रीमद्भगवद्गीता के युग तक जनमानस इस व्यवस्था को भलि तरह से समझता था तथा इसके अनुरूप जीवन भी जीता था। महाभारत युद्ध के 1500 वर्षों पश्चात् यह व्यवस्था भंग होकर रह गई। जीवन में एकतरफा तार्किकता,नैतिकता,धार्मिकता का अभाव होने का कारण नेताओं, धर्माचार्यों,सुधारकों और नीतिज्ञों की शिथिलता रही।कुछ भी नैतिक या अनैतिक करके मनचाहा फल पाने की अफ़रा-तफ़री मच गई। वहीं काल था,जब अनेक प्रकार के एकांगी मतानुयायियों निगंठ नाथपुत्त, सिद्धार्थ गौतम,संजय वेलट्टिपुत्त,प्रकुध कात्यायन,अजित केशकंबल,आजीवक, चार्वाक आदि ने जन्म लिया।इन सभी की विचारधारा सही थी लेकिन एकतरफा थी।उस समय होना तो यह चाहिये था कि पहले से मौजूद सर्वांगीण और बहुआयामी सनातन धर्म और संस्कृति की व्यवस्था में आई विकृतियों को दूर किया जाता। लेकिन ऐसा नहीं किया गया। उपरोक्त महापुरुषों के देहावसान के पश्चात् अनुयायियों ने एकांगी विचारधारा को ही सर्वांगीण जीवन शैली के रूप में प्रचलित और प्रचारित करने के प्रयास शुरू कर दिये।बस,इस अव्यवस्था का लाभ उठाकर अब्राहमिक विचारधारा के अंतर्गत पारसी, यहुदी आदि से प्रेरित जीवन-शैली ने सिर उठाना शुरू कर दिया।
15.) सनातन धर्म और संस्कृति में मीमांसा और श्रीमद्भगवद्गीता में मौजूद कर्म और कर्मफल की व्यवस्था ने अव्यवस्था पर लगाम लगाये रखी थी। इसमें कर्म करने पर जोर था तथा फल पाना अस्तित्व पर छोड़ने का नियम था।इस संदर्भ में सनातन धर्म के ग्रंथ सर्वाधिक वैज्ञानिकता लिये हुये हैं और ये ही जनमानस को सर्वाधिक सहायक सिद्ध हो सकते हैं। उदाहरण के लिये श्रीमद्भगवद्गीता का प्रस्तुत श्लोक जिसमें कर्म और कर्मफल के रहस्य को समझाया गया है। देखिये –
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भूमा ये संगो……….।।(श्रीमद्भगवद्गीता, 2/47)
कर्म करने पर तुम्हारा अधिकार है, फल मिलने पर नहीं।कर्मफल में आसक्ति मत रखो लेकिन कर्म का त्याग भी मत करो। इससे अधिक आध्यात्मिक,धार्मिक, नैतिक, सामाजिक, राजनैतिक और आर्थिक व्यवस्था आज तक इस धरती पर नहीं जन्मी है। लेकिन अब तो एकतरफा भौतिकवाद के प्रचार-प्रसार के कारण लोग नैतिक- अनैतिक, धार्मिक -अधार्मिक, कानूनी- गैर-कानूनी आदि कोई भी कर्म करके जीवन में सफलता पाने का प्रयास कर रहे हैं। इससे अनिश्चितता का बढते जाना आवश्यक होता गया है।लोग मीमांसा सूत्र,श्रीमद्भगवद्गीता, योगसूत्र, योग वाशिष्ठ,महागीता,तंत्रयोग ,मंत्रयोग,
हठयोग आदि तथा विज्ञान और घटिया राजनीति का सहारा लेकर इनकी आड़ में अव्यवस्था फैलाने में लगे हुये हैं।इसका सर्वाधिक नुकसान पुरुषार्थी, मेहनतकश, सत्यनिष्ठ, नैतिक, प्रतिभाशाली और संवेदनशील लोगों को उठाना पड़ रहा है।
16.)आप सबने देख और समझ लिया होगा कि किस तरह से मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम और श्रीकृष्ण के पूजास्थलों की आड़ लेकर हजारों करोड़ रुपए का घपला किया गया है।यह घपला करने वाले कोई अब्राहमिक विदेशी हमलावर मजहबी लोग न होकर खुद को सनातनी कहने वाले लोग ही कर रहे हैं। ऐसे में सुधार और परिष्कार की आशा रखना बहुत कठिन हो गया है। इनको कुछ भी अनैतिक, अधार्मिक और भ्रष्टाचरण करके धन -दौलत और भव्य विलासिता चाहिये। गौमाता को मारकर व्यापार करना,गंगाशुद्धि की आड़ में धन ऐंठना, श्रीमद्भगवद्गीता की आड़ में अय्याशी करना तथा योगविद्या की आड़ में राजनीति करना इनके लिये पाप -कर्म नहीं है। धनसत्ता, धर्मसत्ता, राजसत्ता,प्रैससत्ता,न्यायसत्ता पर कब्जा करके यह सब इनके लिये और भी सहज हो गया है। सनातन धर्म और संस्कृति को फिलहाल विदेशी नहीं अपितु स्वदेशी गौरी, गजनी, चंगेज, नादिरशाह,अब्दाली, बख्तियार, अकबरों और औरंगजेब से खतरा है।
17.) सत्कर्म करते रहना बहुत भलि जीवन शैली है। लेकिन कुछ तथाकथित महापुरुष यह कहते पाये जाते हैं कि दूसरे क्या कर रहे हैं, इससे कोई मतलब मत रखो।बस,निज कर्म करते रहो। वास्तव में यह भी तो अनैतिकता को बढ़ावा देना कहा जायेगा। अपनी क्षमता, परिस्थिति और बलानुसार दूसरों के आचरण और व्यवहार के संबंध में भी जागरुकता करते रहना एक भले व्यक्ति का कर्तव्य है। मुझे क्या और तुझे क्या – वाली जीवन-शैली समाज के लिये घातक सिद्ध हो रही है। समझदार,पदेन और सज्जन कहलवाने वाले व्यक्तियों की चुप्पी ने सामाजिक व्यवस्था को और भी अधिक बिगाड़ दिया है। समाज से यदि कुछ लेते हैं तो बदले में कुछ देना भी चाहिये। पाश्चात्य शैक्षिक प्रभाव और राजनीति में भ्रष्टाचरण के चरम पर होने से भारतीयों में सामाजिक दायित्व बोध कम हो गया है।सब यह सोचने लगे हैं कि जब हमारे आदरणीय नेता, धर्मगुरु, स्वामी, संन्यासी, योगाचार्य,सुधारक, शिक्षक, न्यायाधीश और उच्च अधिकारी ही जमकर देश को लूट रहे हैं तो हम पीछे क्यों रहें?
………
डॉ. शीलक राम आचार्य
दर्शनशास्त्र- विभाग
कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय
कुरुक्षेत्र -136119




