साहित्य

मायके का धन खाकर ससुराल का गुणगान

सपना कुमारी,

मायके का धन खाकर ससुराल का गुणगान

मायके का धन खाकर बहनों को ही ताने देना, उन्हें नीचा दिखाना और खुद को सर्वश्रेष्ठ साबित करना आरती की पुरानी आदत बन चुकी थी।

जब भी वह मायके आती, अपनी बहनों को देखकर तिरस्कार भरे स्वर में कहती,

“तुम लोग तो गांव की सोच वाली हो। हमारे ससुराल में तो ऐसा नहीं होता।”

कभी अपने महंगे कपड़ों का बखान करती, कभी अपने ससुराल वालों की अमीरी का।

उसकी छोटी बहनें चुप रह जातीं। वे सोचतीं, शादी के बाद शायद इंसान बदल जाता है।

लेकिन सच्चाई यह थी कि आरती जितना ससुराल का गुणगान करती थी, उतना ही मायके के योगदान को भूलती जा रही थी।

जब उसकी शादी हुई थी, तब पिता ने अपनी सामर्थ्य से बढ़कर खर्च किया था। कई बार आर्थिक मदद भी मायके से ही मिली थी। त्योहारों पर उपहार, बच्चों के लिए कपड़े, जरूरत पड़ने पर पैसे—सब कुछ मायके ने दिया।

फिर भी आरती का एक ही राग था—

“हमारे लिए जो भी किया है, मेरे ससुराल वालों ने किया है।”

एक दिन तो हद ही हो गई।

आरती अपनी मां से बहस करने लगी और ऊंची आवाज में बोली,

“आपने हमारे लिए किया ही क्या है? जो कुछ किया है, मेरे सास-ससुर ने किया है।”

यह सुनते ही उसकी मां का धैर्य टूट गया।

सालों का दर्द उनकी आंखों में उतर आया।

उन्होंने गुस्से में कहा,

“अच्छा! हमने कुछ नहीं किया? जब जरूरत पड़ती थी तो सबसे पहले किसे फोन किया जाता था? जब परेशानी आती थी तो किसके दरवाजे खुले रहते थे? अगर हम इतने ही बेकार हैं, तो फिर बार-बार यहां आने की जरूरत क्या है?”

आरती चुप हो गई।

मां आगे बोलीं,

“ऐसा करो, अब अपने ससुराल में ही रहो। यहां आने के लिए क्यों परेशान रहती हो? जिस घर ने तुम्हारे लिए कुछ नहीं किया, वहां बार-बार आने का क्या मतलब?”

कमरे में सन्नाटा छा गया।

पहली बार किसी ने आरती को उसकी सच्चाई आईना दिखाया था।

मां की आंखों में आंसू थे।

“बेटी, हमें तुम्हारे पैसे नहीं चाहिए, न तुम्हारी तारीफ। बस इतना चाहिए कि जिन लोगों ने तुम्हें पाल-पोसकर बड़ा किया, उनका अपमान मत करो।”

आरती का सिर झुक गया।

उसे याद आने लगा कि कैसे उसके माता-पिता ने अपनी जरूरतें छोड़कर उसकी खुशियां पूरी की थीं।

उस दिन उसे समझ आया कि ससुराल का सम्मान करना अच्छी बात है, लेकिन उसके लिए मायके को अपमानित करना कभी सही नहीं होता।

क्योंकि जिस पेड़ की जड़ों को इंसान भूल जाता है, उसकी शाखाएं भी ज्यादा दिन हरी नहीं रहतीं।

— सपना कुमारी, कोल्हापुर

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