
टी जन्मे घर आंगन
खुशियों से भर जाए
लक्ष्मी का रूप धरे
किस्मत वो चमकाए
बोझ नहीं वरदान है
कहते सारे वेद
कोख में कत्ल क्यों
सवाल ये हर बार
बेटी पढ़े आगे बढ़े
नाम रोशन कर जाए
चांद तक पहुंची है
कल्पना चावला याद
मेरी कॉम मुक्के बरसाए
देश का मान बढ़ाए
खेत में हल चलाए
बेटी भी कम नहीं
ऑफिस से घर संभाले
दोनों हाथों ताली
दहेज की आग बुझे
जब सोच ये बदले
भ्रूण हत्या पाप है
कानून भी ये कहे
बेटी को दो पंख
उड़ान वो खुद भरे
आसमान भी छोटा पड़े
हौसला जब उड़ जाए
बेटियां बोझ नहीं
शान है अभिमान है
– रिया राणावत
कालीदेवी, झाबुआ (म.प्र.)



