
एक बार एक कवि समीक्षकों का इंतजार कर रहा था कि कोई समीक्षक खुद आये उसकी रचनाओं पर समीक्षा के दो चार शब्दों की बौछार कर दे ताकि वह भी बहती गंगा में डुबकी लगा ले लेकिन कई सालों तक इंतजार करता रहा। कोई समीक्षक आये। कोई फूटी आंख तक नहीं देखा।
विवश होकर एक दिन कवि एक समीक्षक के पास गया। उसने उस समीक्षक से अपनी रचनाओं की समीक्षा के लिये निवेदन किया। समीक्षक कवि को देखकर ऐसा मुस्कराया जैसे कसाई मजबूत बकरे को देखकर मुस्कराता है।
समीक्षक ने कवि की औकात जानने के लिए पूछा। महोदय आपकी कमाई कितनी हो जाती है। आप कुछ गरीब घराने से लगते हैं। नरम-गरम करके हो जायेगा। कवियों की भावनाओं का आदर करना मेरा नैतिक कर्तव्य है।
आदरणीय कवि महोदय, हमारा ध्येय है। कोई गरीब से गरीब कवि की भी समीक्षा हो। हल्के में ले देकर निपटा देते हैं। अगर कुछ ज्यादा भुगतान कर देते हैं तो उसी आधार पर समीक्षा को बढ़ा चढ़ा कर लिख देते हैं। झूठी तारीफों का पूल बाँध देते हैं।
चढ़ावा के उपर निर्भर करता है। जितना ज्यादा से ज्यादा भुगतान करने में कवि सक्षम रहता है। हम भी निराला, महादेवी से भी ज्यादा दो चार हाथ बढ़ा कर लिख देते हैं। हमारे अंदर अतिश्योक्ति गुण की खान है। झूठी प्रशंसा करना है। शब्दों की कारीगरी है।
शब्दों की कारीगरी से आपकी रचना को ताजमहल से भी ज्यादा खूबसूरती निकालने में सक्षम हूँ। शब्दों के मक्कडजाल से एक से एक बड़े रचनाकारों को मुंह के बल पटकनी दे देता हूँ।
सीधा व सरल प्रवृत्ति का कवि समीक्षक महोदय को फटी आंखों से ताकता रहा। एकटक देखता रहा जैसे किसी सुंदरी को प्रथम बार देखा हो और अपलक देखता रह गया हो। कवि की गति शून्यावस्था जैसे हो गयी।
जैसे किसी सुंदरी की फटकार सुनकर प्रेमी सहमा हो और धीरे से बिना कुछ बोले उठकर चल दे उसी प्रकार समीक्षक की बातें कवि के ह्रदय पर गहरा आघात किया। धीरे से कवि अपनी कविता की पोटली उठा कर घर की तरफ मुंह लटका कर रवाना हो गया। आज तक कोई समीक्षक नहीं मिला।
……
जयचन्द प्रजापति ‘जय’
प्रयागराज




