
वो ग़ैर कैसे हो गया?
जिसे अपना समझा था मैंने,
हर राह में जो साथ चला,
जिसके संग सपनों की दुनिया को,
मन ने चुपके-चुपके चुना।
वो जाने किस मोड़ पे आकर,
हाथ छुड़ाकर खो गया,
कल तक जो धड़कन में बसता था,
वो ग़ैर कैसे हो गया?
जिसके हँसने से खिलते थे,
मन के सूने आँगन में फूल,
खुशियाँ दे उसको अपना समझा,
जिससे वो सारे दुःख जाए भूल।
आज वही आँखें फेर गया,
रिश्तों का दीपक बुझा गया,
जिसे दिल ने अपना माना था,
वो ग़ैर कैसे हो गया?
न कोई शिकवा, न शिकायत,
बस इतना सा सवाल था,
क्या झूठे थे वे सारे वादे,
या मेरा ही सिर्फ ख़याल था?
समय बदलता है लोगों को,
यह बात समझ में आ गई,
पर अपना कहने वाला ही,
वो ग़ैर कैसे हो गया?
अब यादों के सूने घर में,
बस उसकी आहट रहती है,
दिल फिर भी उसको अपना कहे,
ये कैसी चाहत रहती है।
कभी मिले तो पूछूँ उससे,
क्या रिश्ता इतना कमज़ोर था?
कि मेरे प्रेम को किनारा कर,
वो ग़ैर कैसे हो गया?
स्वरचित मौलिक अभिव्यक्ति
सुमन बिष्ट, नोएडा



