
विकास शील देश में अपने, छुआछूत है अभिशाप हुआ।
प्रभु के प्रति अपराध बोध यह, मानवता के प्रति पाप हुआ।।
अरुण रक्त सब में है बहता,हम सब ईश्वर की संतानें।
धरा गगन रवि चंद्र एक ही, दिया ईश ने हम सब मानें।।
श्रमिकों ने ही महल बनाया, उसी महल में हम हैं रहते।
मजदूरों ने अन्न उगाया,उसी अन्न का भोजन करते।।
जातिवाद में बंँटा मनुज यह, ईश्वर को भी दाँव दे रहा।
छुआछूत कलंक समाज का, ऊंँच-नीच को बाँव दे रहा ।।
सबसे श्रेष्ठ वही समाज में, जिसके भीतर मानवता है।
जिसमें यह गुण नहीं समाहित, उसके भीतर दानवता है।।
कूप वही मजदूर खोदता, जिसका पानी हम पीते हैं।
उसके कर से पानी पीना, घृणा भाव में हम जीते हैं।।
छुआछूत है रूढ़िवादिता, आओ मिलकर प्रतिकार करें।
दीन-हीन वंचित जन को हम, गले लगा कर नित प्यार करें।।
सुख-दुख को मिलकर हम बाँटे, छल दंभ द्वेष से दूर रहें।
सत्य धर्म निष्ठा अपनाकर, सारे जग में मशहूर रहें।।
प्रेम दया करुणा समता का, उपवन हम नया सजाएँगे।
छुआ-छूत का भेद मिटा कर,उर की बगिया महकाएंँगे।।
संस्कारों को कभी न भूलें, गीता का संदेश यही है।
सबका ही सम्मान करें हम, शुचि सुखमय परिवेश यही है।।
डॉ गीता पांडेय ‘अपराजिता’
सलोन रायबरेली उत्तर प्रदेश




