
कड़ी धूप में श्रमिक
पसीना बनता जीवन
तुम्हारे लिए
ईंटों का भार उठाता
चुपचाप गढ़ता दुनिया
तुम्हारे लिए
रोटी की खातिर मेहनत
रातें होती छोटी
तुम्हारे लिए
सड़क किनारे सोता मजदूर
आसमान ओढ़े रहता
तुम्हारे लिए
हाथों में पड़े छाले
मुस्कान नहीं खोई
तुम्हारे लिए
धूल भरे कठिन रास्ते
जीवन रचता श्रमिक
तुम्हारे लिए
मजबूरी संग चलता जीवन
कंधों पर जिम्मेदारी
तुम्हारे लिए
पसीने की हर बूंद
लिखती नई कहानी
तुम्हारे लिए
दिनभर जलता तन मन
फिर भी नहीं रुकता
तुम्हारे लिए
छोटे सपनों की खातिर
बड़ी लड़ाई हर दिन
तुम्हारे लिए
नंगे पांव चलती राहें
पत्थर भी चुभते
तुम्हारे लिए
रोज कमाता रोज खाता
कल की गारंटी नहीं
तुम्हारे लिए
भूख से लड़ता हर पल
आशा फिर भी जिंदा
तुम्हारे लिए
ईंट गारे से बनता घर
पर उसका नहीं होता
तुम्हारे लिए
श्रम से चलता यह संसार
फिर भी उपेक्षित श्रमिक
तुम्हारे लिए
डाॅ.शिवेश्वर दत्त पाण्डेय



