साहित्य

दीदार

उदय किशोर साह

साहिल की रेत पे बैठा हूँ मैं अकेला
करता हूँ तेरी बेसब्री से     इन्तजार
हल्की धुंधली कुहासा उतर     आई
दिल में  आरजू है तेरा ही  इन्तजार

पहाड़ों की बदन से टकराई पुरवाई
प्रीत में बह रही है मिलन की बयार
मेरे मन को छू कर   उड़ उड़ जाती
तेरी यादों में   सावन की      फुहार

रात तन्हा में हमने   हर पल गुजारा
नींद भी रूठ चली   गई आ मेरे द्वार
सूना सुना लगता है  मेरा  घर आँगन
रोग ये कैसी क्यां      यही है     प्यार?

ख्यालों में गुमसुम       बैठा दिन रात
जेहन में उभरती     तेरा ही एक नाम
पतझड़ सी हो गई है मेरी       दनियां
कर दो मेरे जीवन की बिगया गुलजार

एक झलक अपनी सूरत आ दिखला दो
चैन आ जाये मेरे जीवन में मेरे        यार
मरना भी मंजूर हमें है इस दुनियां में अब
तरस खाओ मेरे हालात    पे मेरे दिलदार

उदय किशोर साह
मो० पो० जयपुर जिला बांका बिहार

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