साहित्य

तुम्हारा अपनापन 

मुल्क राज

नजरों में देखा अपनापन,इक मीठा सा एहसास जगा,

बरसों से था जो दिल सूना, आज वहां एक दीप जला।

 

कम होने लगी सब दूरियां, जब पास हमारे तुम आए,

खामोश लबों की बातें भी हम चुपके से सुन आए।

 

क्या जादू था उन आंखों में, जो दिल मेरा यू खो बैठा,

कल तक था बेगाना सा वो आज मुकद्दर हो बैठा।

 

उम्मीद की एक नई धूप खिली, इस दिल के सूने आंगन में,

हर ख्वाब हकीकत लगने लगा तुमको पाने को जीवन में।

 

सदियो का सफर पल भर का लगा जब थाम लिया तुमने ये हाथ,

अब डर ना रहा इस दुनिया का, बस छूट ना तेरा मेरा साथ।

 

नजरों का वो भोला अपनापन, सांसों में महकता रहता है,

यह “आकाश” तुम्हारे प्यार में अब हर पल बहता रहता है।

 

 

पंडित मुल्क राज “आकाश”

गाजियाबाद उत्तर प्रदेश

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