साहित्य

ग़ज़ल: प्रेम ग्रंथ

-डॉ. दक्षा जोशी'निर्झरा

जो दिलपे, अमर पैग़ाम है।

ख़ुदको खोकर कुछ

पाना आसान है?

जहाँ बुद्धि का न कोई काम है,

तर्क़ की बंदिश भी जहाँ नाका़म है।

कश्ती अक़्ल की जहाँ डूब जाए,

वही तो प्रेम का आख़िरी मक़ाम है।

दुनिया समझे जिसे बस एक आसक्ति,

मुक्ति के सायुज्य की वह शाम है।

विष मीरां का बना जहाँ अमृत,

क़तरे को समंदर करता वह जाम है।

मिट जाए जहाँ यह ‘मैं’ की हस्ती,

‘तू’ में लीन होना सच्चा काम है।

शून्य हो जाए जहाँ पर अहम्,

उसी का तो दूजा नाम ‘प्रेम’ है।

महल सजाए बैठे हैं लोग जिसे,

शबरी के बेरों का वह विश्राम है।

रूह बदल दे भीतर से ‘निर्झरा’,

करुणा का बहता हुआ वह पैग़ाम है।

मिटकर ही मिलता है जहाँ सुकूँ,

अमर उस ग्रंथ का यही अंजाम है।

 

-डॉ. दक्षा जोशी’निर्झरा’

अहमदाबाद, गुजरात।

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