साहित्य

सुबह-सुबह की बारिश 

डॉ. प्रभा जैन

हल्की-हल्की फुवारें

जिस्म और चेहरे से टकराती,

आ रही है भीनी-भीनी खुशबू माटी की

जिस्म बैचैन कर जाती।

 

देख रहा कोई अलसाई आँखों से

ले कसमसाई सी अंगड़ाई,

नयनों में देख रहा है एकटक।

 

है किसकी नज़र, टकटकी

पक्षी बोल रहा ट्वीट-ट्वीट,

ढुलक-ढुलक गिरी बूंद पत्तों पर

और देख उसे झट पी गया पक्षी उसे।

 

बारीक़-बारीक़ बूंदे

जो चल रही बिजली तार पर,

देखती मैं, जमीन पर गिरती जब

खोने का एहसास कुछ

क्यों आता मन में।

 

वो गिरती हुई बूंद है

जब माटी में मिली,

एहसास जैसे, भुला दिया किसी ने

या मैं कहीं खो गयी।

 

क्या वहम है मेरा

या किसी गलती का सुधार,

छाए है बादल नभ में

क्या यह बरस रहे…..

क्या यह बरस रहे या

हो रही मेरी आँखे नम।

 

जमीं है पूरी गीली-गीली

मन अंतस भी गीला-गीला,

हो रही रिमझिम-रिमझिम

बारिश होती नहीं दिख रही।

 

खिल-खिला रहे पत्ते

या दिल खोल कोई हँस रहा,

कुछ गिरा मेरे दिल पर

या यूहीं आँख नम हुई।

 

ये बारिश की बूंदे

क्यों नमकीन लग़ रही,

क्यों बाहर और मन अंतस का

मौसम एक हो रहा

 

स्वरचित

डॉ. प्रभा जैन “श्री ”

देहरादून

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