
गुवाहाटी की ;मां कामाख्या की धरा से आने वाली वरिष्ठ लेखिका,कवयित्री,प्रसार भारती उद्घोषक मधु माहेश्वरी जी की दूसरी एकल पुस्तक पाठकों के हाथों में आ गई है जिसका विमोचन वरिष्ठ नागरिक काव्य मंच के बैनर तले चार जुलाई 2026 को वनाकाम के वैश्विक अध्यक्ष राजेंद्र निगम राज जी के आतिथ्य में बेंगलुरु में किया गया।मंच को सुशोभित करने वाले विशिष्ट अतिथि गण थे: इंदु राज निगम,विजय मोहन सिंह,सरला सरल,विनीता लवानिया और राम स्वरूप कुशवाह।इसी दौरान मंच की जुलाई माह की काव्य गोष्ठी भी आयोजित की गई जिसमें तीस से ज़्यादा कवि /कवयित्रियों ने भागीदारी की।
कलम और कॉलम: लेखक की कलम से शुरू होकर पुस्तक संस्मरण ‘रिक्शावाला’ तक पहुँचकर विराम लेती है। माँ शारदे वंदन और श्रीराम स्तुति के बाद इस पुस्तक में सभी गद्य रचनाएँ हैं जिनमें आलेख हैं, लघुकथा है, कहानी है और संस्मरण है।
शुरुआत में ही लेखिका स्वयं बताती हैं कि यह पुस्तक उनके 2023 से 2026 तक अलग-अलग प्रांतीय, राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय अखबारों / मैगज़ीन, पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित सामग्री का संकलन है और इस कसौटी पर देखा जाये तो पुस्तक का नाम ‘क़लम और कॉलम’ बिल्कुल सटीक बैठता है जिसका आभास इसके मुखपृष्ठ से भी हो जाता है।
लेखक की कलम से: पृष्ठ पढ़ते हुए मैंने जाना कि यह मुखपृष्ठ मधुजी की ही पोती ने डिज़ाइन किया है जो भीतर की सामग्री को पूरी तरह जस्टीफाई करता है। इस कवरपेज के ज़रिये उनकी पोती की क्रियाशीलता भी हमारे सामने आती है। यही तो है; नई और पुरानी पीढ़ी का सामंजस्य।
इस पुस्तक को मधुजी ने अपने दादाजी को समर्पित किया है जो निश्चित ही बुज़ुर्गों के प्रति उनके सम्मान और प्यार को दिखाता है।
अब आयें अनुक्रमणिका पर — तो इस संग्रह में 57 रचनाएँ शामिल हैं; सब अलग-अलग विषयों पर: जो मधुजी की बहुमुखी सृजनशीलता का परिचय देती हैं। ईमानदारी से कहूँगी कि मैं इस पुस्तक को पूरा नहीं पढ़ पायी, मगर जितना भी पढ पायी, वो इस बात को स्पष्ट कर ही देता है कि इनकी लेखनी में हमारी संस्कृति और संस्कारों से सरोकार झलकता है।
अपनी रचनाओं के द्वारा ये परिस्थिति का समाधान खोजने का भी प्रयास करती हैं।दरअसल वही तो है एक सच्चे साहित्यकार का दायित्व कि वह समस्याओं के भँवर में आपको ले जाकर वहाँ से बाहर आने का रास्ता भी सुझाने का प्रयास करे।
रीति-रिवाज, आत्मस्वीकृति, रफ़्तार में उलझती ज़िंदगी, बढ़ता डिप्रेशन, नारी सुरक्षा, योगेश्वर कृष्ण, अन्न की बर्बादी क्यों, जजमेंटल क्यों बनना, त्योहारों को भुनाता बाज़ारवाद; यानी कितने विविधतापूर्ण विषय समाहित किये गए हैं जिन्हें लेखिका तो अपने अनुभवों का ख़ज़ाना मानकर सहेजना चाहती ही हैं, हम भी इसे सहेज कर रखें तो कोई घाटे का सौदा न होगा।
ख़ुशी की बात यह है कि मधुजी गद्य और पद्य — दोनों विधाओं में कुशलता से लिखती हैं। इनका साहित्य-सृजन बड़ी ही सीधी सरल भाषा में होता है जिससे पाठक बड़ी सहजता से इनसे जुड़ जाता है।
एक और सुंदर बात जो मुझे लगी, वो यह कि हर लेख, कहानी, संस्मरण के साथ उसकी पब्लिशिंग कटिंग दी गई है जो इस पुस्तक को नया कलेवर दे रही है। चार पंक्तियाँ देखिये हिन्दी पर —
नहीं महज़ भाषा है हिन्दी
जीने का ये तरीका है
भारत-भू के संस्कारों को
हिन्दी से ही सीखा है
अब थोड़ा सा लेखक के बारे में भी बात होनी चाहिए —
राजनीतिशास्त्र में एम ए, बी.एड., डिग्री कॉलेज में लेक्चरर से करियर की शुरुआत, ऑल इंडिया रेडियो गुवाहाटी में उद्घोषक (काउंसलर), इंटरव्यूअर, अनुवादक, वार्ताकार, टी.वी. हेतु ऐंकरिंग,वॉयस ओवर, नैरेशन और बताऊँ कि इनकी पहली रेडियो वार्ता प्रसारित हुई AIR रामपुर से 1975 में।
जैसे जैसे आप इनकी रचनाओं को पढ़ेंगे,आप इनसे और भी परिचित होते जायेंगे।
मधु जी को उनकी दूसरी एकल पुस्तक के लिए बहुत बहुत शुभ कामनाएं।




