
महाकुम्भ केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति, अध्यात्म, लोकजीवन और राष्ट्रीय एकात्मता का विराट उत्सव है। इसी भाव को सशक्त रूप में अभिव्यक्त करती है आदरणीया डॉ. पूर्णिमा पाण्डेय “पूर्णा” की कृति “प्रयागराज का महाकुम्भ 2025 – आस्था का महामेला”।
पुस्तक का आवरण आकर्षक एवं विषयानुकूल है। भूमिका, शुभकामना संदेश और सुव्यवस्थित अनुक्रमणिका इसकी गंभीरता तथा अध्ययन-उपयोगिता को प्रमाणित करते हैं। लेखिका ने महाकुम्भ की पौराणिक पृष्ठभूमि, ऐतिहासिक विकास, प्रयागराज की धार्मिक महिमा, अखाड़ा परंपरा, नागा संन्यासियों, कल्पवास, शाही स्नान, संत-समागम, सेवा-भाव तथा प्रशासनिक व्यवस्थाओं का संतुलित एवं प्रामाणिक विवेचन किया है।
डॉ. पूर्णिमा पाण्डेय “पूर्णा” ने केवल तथ्य प्रस्तुत नहीं किए, बल्कि महाकुम्भ की आध्यात्मिक अनुभूति और सांस्कृतिक दर्शन को भी प्रभावी ढंग से शब्दों में मूर्त रूप दिया है। उनकी भाषा सरल, प्रवाहपूर्ण, परिमार्जित तथा साहित्यिक गरिमा से युक्त है। वर्णन और भावाभिव्यक्ति का संतुलन पुस्तक को विशेष पठनीय बनाता है।
इस कृति का प्रमुख वैशिष्ट्य यह है कि यह महाकुम्भ को केवल आस्था का पर्व न मानकर भारतीय संस्कृति, सामाजिक समरसता और वैश्विक सांस्कृतिक धरोहर के रूप में प्रस्तुत करती है। विविध भाषाओं, प्रांतों और परंपराओं से जुड़े करोड़ों लोगों का एक सूत्र में बंधना भारत की सांस्कृतिक शक्ति का सशक्त प्रमाण है, जिसका सुंदर चित्रण पुस्तक में मिलता है।
आलोचनात्मक दृष्टि से पुस्तक की विषयवस्तु व्यापक, तथ्य विश्वसनीय और प्रस्तुति प्रभावशाली है। यदि कुछ और छायाचित्र अथवा मानचित्र जोड़े जाते तो इसकी संदर्भ-उपयोगिता और अधिक बढ़ सकती थी, किंतु इससे पुस्तक के समग्र मूल्य पर कोई विशेष प्रभाव नहीं पड़ता।
समग्रतः “प्रयागराज का महाकुम्भ 2025 – आस्था का महामेला” भारतीय सांस्कृतिक चेतना का एक महत्त्वपूर्ण दस्तावेज है। यह साहित्यकारों, शोधार्थियों, अध्यापकों तथा सामान्य पाठकों सभी के लिए समान रूप से संग्रहणीय, पठनीय और प्रेरणादायी कृति है। लेखिका आदरणीया डॉ. पूर्णिमा पाण्डेय “पूर्णा” इस उत्कृष्ट एवं शोधपरक कृति के लिए हार्दिक बधाई और साधुवाद की पात्र हैं। विश्वास है कि यह पुस्तक महाकुम्भ विषयक अध्ययन में एक महत्त्वपूर्ण संदर्भ-ग्रंथ के रूप में प्रतिष्ठित होगी।
— डॉ. ओम प्रकाश मिश्र ‘मधुब्रत’
(अज्ञातमेघार्जुनजमदग्निपुरी)




