
कोहरे की मार बहुत, पेड मुरझे तमाम।
शीत भंयकर हो रही, हुआ न कोई काम।।
छुपा बादलों में शहर, कुछ भी तो पहचान।
कुहरा चारों ओर है, होता नहीं न भान।।
घना हुआ है कोहरा, हुई कॅंपाती ठंड।
दिनकर भी दिखता नहीं,प्रकृति देती दण्ड।।
पराभूत अब हैधरा, शीत दिखाता कोप ।
प्रभु अब तो सुन लीजिये, ठंड करो अब लोप।।
पशु पक्षी सब मर रहे, शीत बढ़ी है जोर।
वृद्ध सभी अब कष्ट में, प्रभु क्यों हुए कठोर।।
डॉ उषा अग्रवाल जलकिरण
छतरपुर मध्यप्रदेश




