आलेख

आचार्य विष्णुगुप्त चाणक्य और इटालियन मैक्यावली

डॉ. शीलक राम आचार्य

आचार्य कौटिल्य महाभारत युद्ध के पश्चात् दुनिया के ज्ञात इतिहास के राजनीति,अर्थनीति, कूटनीति और धर्मनीति के सबसे बड़े ज्ञाता हैं।अपने ‘अर्थशास्त्र’ के प्रथम अधिकरण में कहते हैं-‘विद्याविनीतो राजा हि प्रजानाम् विनये रत:…….’ अर्थात् विद्या से समन्वित राजा ही प्रजा को सुरक्षित बना सकता है।जो राजा अपनी प्रजा के हित में तत्पर रहता है,वही शत्रुरहित इस पृथ्वी का आनंद से उपभोग करता है। लेकिन आजकल तो राजनीति में अनपढ़ नेताओं की भरमार है।पढाई- लिखाई के नाम पर उन्हें कोई ज्ञान नहीं होता है।हां, जनता-जनार्दन को बेवकूफ बनाने,उनका शोषण करने,उस पर ज़ुल्म करने तथा उसे सुविधाओं से वंचित करने में ऐसे अनपढ़ नेताओं की किसी से कोई बराबरी नहीं हो सकती है।जिस व्यक्ति में विद्याध्ययन की योग्यता ही न हो,वह तो तानाशाही और धींगामुश्ती से ही शासन करेगा। आचार्य कौटिल्य ने कहा भी है-‘क्रिया हि द्रव्यं विनयति नाद्रव्यम्’-अर्थात् कोई भी क्रिया की जाये,वह तदनुकूल व्यक्ति को उसके योग्य बना सकती है। परंतु जिसमें योग्यता ही न हो, उस पर कितना भी परिश्रम किया जाये,वह अपात्र व्यक्ति कभी भी उस शिक्षा को ग्रहण करने में समर्थ नहीं हो सकता। विद्या ग्रहण करने के लिये शास्त्र सुनने की इच्छा, शास्त्र को सुनना, सुने हुये का ग्रहण करना, ग्रहण किये हुये को धारण करना, धारण किये हुये पर तर्क वितर्क करना तथा उसके तत्व का पूरा ज्ञान प्राप्त करना।ये उपरोक्त गुण ही किसी व्यक्ति को सही मनुष्य बना सकते हैं। इसके अतिरिक्त उदंड, अनुशासनहीन और संयम रहित व्यक्ति को विद्या कोई लाभ नहीं दे सकती है।
आचार्य कौटिल्य या कौटिल्य या विष्णगुप्त चन्द्रगुप्त मौर्य के मंत्री थे। भारतीय मान्यतानुसार उनका काल ईसापूर्व 1800 का रहा है। पाश्चात्य पूर्वाग्रहग्रस्त मूर्ख लेखकों जाली,कीथ और विंटरनित्स ने अर्थशास्त्र का लेखक कौटिल्य को इसलिये नहीं माना कि क्योंकि मंत्री पद पर रहते हुये उन्हें लिखने का समय नहीं मिला था। इन बेवकूफों से पूछो कि भारत सहित यूरोप, अमरीका आदि देशों के राष्ट्रपतियों, प्रधानमंत्रियों, गृहमंत्रियों ने पुस्तकें लिखी हैं, तो चाणक्य ऐसा क्यों नहीं कर सकते।बस, कुछ भी हो भारतीय इतिहास को विकृत करना ही पाश्चात्यों का उद्देश्य रहता आया है। पाश्चात्य लेखकों के लिये भारतीय लेखकों की अपेक्षा पाश्चात्य लेखक मेगस्थनीज, फाह्यान आदि हमलावर और मनघड़ंत इतिहासकार अधिक विश्वसनीय हैं।मैगस्थनीज ने तो अपने ‘इंडिका’ नामक ग्रंथ में भारत के संबंध में जानबूझकर मनघड़ंत कपोल-कल्पनाएं, ऊटपटांग जानकारियां तथा भेदभावपूर्ण टिप्पणियां की हैं। मैगस्थनीज को भारतीय भाषाओं का ज्ञान ही नहीं था, उस बेवकूफ ने लिखा है कि भारतीय पढना-लिखना नहीं जानते थे। कौटिल्य के अर्थशास्त्र में 15 अधिकरण,150 अध्याय,180 विषय एव 6000 श्लोक हैं। गद्य भाग को छोड़कर 340 श्लोक हैं। भाषा महर्षि पाणिनि की रचना अष्टाध्यायी के अनुसार है। यह विश्वप्रसिद्ध ग्रंथ आज से लगभग 3800 वर्षों पहले की भारत की राजनीतिक, सामाजिक, सुरक्षात्मक, आर्थिक, धार्मिक, नैतिक और दार्शनिक अवस्था और व्यवस्था का विवरण देता है।
मुख्यतः इस ग्रंथ में राजा के शासन-प्रशासन-अनुशासन, राज्य विभाग के पर्यवेक्षक, न्याय शासन, दंडविधान, दरबारियों का आचरण, सार्वभौमिक सत्ता के तत्व, राज्य मंडल की छह धाराएं, सार्वभौम सत्ता के तत्वों के व्यसन, युद्ध-आक्रमण-सेना, सैन्य व्यूह रचना, नगरपालिका और व्यवसाय निगम, शत्रु से व्यवहार, दुर्ग निर्माण, गुप्तचर, गुप्त साधन आदि विषयों के संबंध में विस्तार से बतलाया गया है। कौटिल्य ने अपने अर्थशास्त्र में वेद, वेदांग, पुराण, इतिहास, धर्मशास्त्र, अर्थशास्त्र आदि का भी उल्लेख किया है। कौटिल्य के समय पर भारत की राजभाषा संस्कृत थी। अर्थशास्त्र में बौद्ध मत के संबंध में कोई विवरण नहीं मिलता है। इससे सिद्ध है कि उस समय बौद्ध मत मौजूद नहीं था। कौटिल्य के कयी सदी पश्चात् बौद्ध मत शुरू हुआ था। ‘शाक्य ‘शब्द का प्रयोग अर्थशास्त्र,3/20 में अवश्य हुआ है। कौटिल्य को महाभारत का भी ज्ञान था क्योंकि उन्होंने दुर्योधन,अर्जुन, जनमेजय आदि शब्दों का प्रयोग किया है। पुराणों के संबंध में भी वो परिचित थे। दुर्गों के मध्य में देवताओं के पूजास्थलों की स्थापना का उल्लेख भी उल्लेख कौटिल्य ने किया है। शिव, ब्रह्मा, इंद्र, यम स्कंद को अपना मुख्य द्वार के इष्ट देवताओं में गिनवाया है।
आचार्य कौटिल्य ने विद्या के चार प्रकार-आन्वीक्षिकी, त्रयी, वार्ता और दंडनीति को माना है। आन्वीक्षिकी में मीमांसा,वैशेषिक, न्याय,सांख्य,योग, चार्वाक आदि को माना है। इसे वेदों की शिक्षाओं पर आधारित ‘षड्दर्शनशास्त्र’ भी कह सकते हैं।त्रयी के अंतर्गत चार वेदों की गिनती होती है। इसमें शिक्षा,कल्प व्याकरण, निरुक्त ,छंद और ज्योतिष आदि भी समाहित हैं। वार्ता के अंतर्गत खेती-बाड़ी, पशुपालन, व्यापार, प्रबंधन आदि आते हैं। दंडनीति उपरोक्त सभी विद्याओं की सुरक्षा के लिये होती है। इनमें आन्वीक्षिकी अर्थात् दर्शनशास्त्र के संबंध में कौटिल्य ने ‘प्रदीप: सर्वविद्यानामुपाय: सर्वकर्मणाम्,आश्रय सर्वधर्माणां शश्वदान्वीक्षकी मता'(अर्थशास्त्र,1/3) कहा है। यहां पर आचार्य कौटिल्य ने ‘दर्शनशास्त्र’ विषय को सर्वोच्च स्थान प्रदान किया है।अर्थशास्त्र की रचना आचार्य कौटिल्य ने पहले से ही मौजूद कयी अर्थशास्त्रों का अध्ययन, अवलोकन और निष्कर्ष निकालकर की थी।
राजा के कर्तव्यों को बतलाते हुये आचार्य कौटिल्य अर्थशास्त्र,1/6 में कहते हैं कि यदि राजा शास्त्रों के विरुद्ध चल पड़ा तथा काम,क्रोधादि का गुलाम हो गया,तो वह समुद्रों तक फैली समस्त धरती से अपना शासन खो देगा तथा एक दिन विनाश को प्राप्त हो जायेगा।राजा का इंद्रियजयी होना आवश्यक है।कहा गया है -‘धर्मार्थाविरोधेन कामं सेवेत।न निस्सुख: स्यात्।समं वा त्रिवर्गमन्योन्य नुबंधन्।एको हृत्यासेवितो धर्मार्थकामानामात्मानमितरौ च पीडयति (अर्थशास्त्र,1/7)।
उपरोक्त का अर्थ है कि राजा धर्म और नीति का व्यवहार करे।सुख को छोड़कर पागलों की तरह नहीं रहना चाहिये। एक दूसरे से बंधे हुये धर्म, अर्थ,काम का समय समय पर सेवन अवश्य करना चाहिये। अज्ञानता से यदि एक का भी अनुचित सेवन करता है तो वह अपना और धर्म आदि में से किसी एक अन्य एक का विनाश कर लेता है।
आचार्य कौटिल्य ने ‘अर्थ एव प्रधान इति कौटिल्य:’ कहकर अर्थ के अधीन समस्त संसार को माना है।अर्थ से काम और धर्म संपन्न होते हैं। अर्थ के बिना सब व्यर्थ है। व्यक्ति को अर्थ कमाने में आगे रहना चाहिये ताकि काम और धर्म का भोग किया जा सके। कौटिल्य ने संन्यासियों को गुप्तचर बनाने की व्यवस्था की है। उन्होंने सभी संप्रदायों के संन्यासियों को ‘सर्वप्रव्रजिताश्च स्वं स्वं वर्गमुपजपेयु:’ कहकर गुप्तचर के रूप में राजा का कार्य करने को कहा है।यह अतीव महत्वपूर्ण है।
जहां आजकल सत्ता के नशे में मत्त नेता किसी भी वर्ग से बातचीत और संवाद नहीं करते हैं, वही पर कौटिल्य ने कहा है कि राजा को केवल बुद्धिमान व्यक्ति के साथ ही नहीं अपितु सभी के मत को ध्यान से सुनने की सीख दी है। बुद्धिमान राजा तो एक अबोध बालक की भी सार्थक सलाह को सुने-‘बालस्याप्यर्थवद् वाक्यमुपयुंजीत् पंडिता:’।
लेकिन यहां तो हालात ऐसे संकीर्ण हो गये हैं कि धरतीपुत्र किसान मजदूर भी राजधानी में महीनों तक धरने प्रदर्शन करते हुये मर जाते हैं लेकिन उनकी सलाह को सुनने के लिये कोई तैयार नहीं होता है। सत्य स्वदेशी और राष्ट्रवाद में मेहनतकश लोग यदि उपेक्षित और प्रताड़ित रहेंगे,तो वह राष्ट्र कभी भी तरक्की नहीं कर सकता है। आचार्य चाणक्य ने अनपढ़ या कम पढ़े लिखे को मंत्री पद नहीं देने की बात की है। अवलोकन कीजिये –
एवमश्रुतशास्त्रार्थो न मंत्रं श्रोतुमहर्ति।। अर्थशास्त्र,1/16
एक अन्य कमाल की बात आचार्य चाणक्य ने कही है। उन्होंने नेताओं को आगाह किया है कि अपनी संतान, अपने संबंधियों और मित्रादि से सदैव सावधान रहें।वही एक नेता या मंत्री या राजा के लिये सबसे पहले और सबसे बड़ा खतरा बनते हैं। विशेषकर राजपुत्रों और पत्नी से राजा को पूरी तरह से सावधान रहने की आवश्यकता है। देखिये –
रक्षितो राजा राज्यं रक्षत्यासन्नेभ्य: परेभ्यश्च।
पूर्वं दारेभ्य: पुत्रेभयश्च।
दाररक्षणं निशांतप्रणिधौ वक्ष्याम:।
पुत्ररक्षणं।
आचार्य चाणक्य की उपरोक्त सीख आजकल के नेताओं के लिये बड़े काम की है,यदि वो इस सीख को स्वीकार करने की हिम्मत रखते हों तो? आजकल के अधिकांश नेता, विधायक, सांसद और मंत्रियों की स्वयं की औलादें ही उनकी बदनामी, विफलता और टांग खिंचाई का कारण बनती हैं।इसीलिये आचार्य चाणक्य ने आज से अड़तीस सदी पूर्व ही नेताओं को स्वयं की औलाद और पत्नी से सावधान रहने को कह दिया था। उन्होंने राजकुमारों की तीन श्रेणियां बुद्धिमान,आहार्य बुद्धि और दुर्बुद्धि कही हैं। आजकल के राजनीतिक परिवेश में तो अधिकांश राजकुमार दुर्बुद्धि कोटि के ही मिलेंगे।
एक राजा का जैसा भी आचरण होगा,प्रजा भी वैसी ही होगी। लेकिन आजकल के राजा या नेता तो खुद अवगुणों की खान होकर जनता- जनार्दन को नैतिक और सत्यनिष्ठ होने की सीख देते हैं। देखिये –
राजानमुत्तिष्ठामानमनूत्तिष्ठंते भृत्या:।
प्रमाद्यंतमनुप्रमाद्यंति।
कर्माणि चास्य भक्षयंति।
अर्थात् राजा का आचरण उदार होगा तो उसके सेवक भी उत्तम विचार के होंगे।जो राजा प्रमाद करेगा,तो उसके अनुचर भी प्रमादी होंगे।राजा के पुरुषार्थ को प्रमादी अनुचर समाप्त कर देते हैं।
आचार्य चाणक्य की प्रशासनिक सुझबुझ भी कमाल की है।राजा द्वारा निकाले गये किसी आदेशरुपी आलेख में तेरह अर्थ निकलने चाहियें। वो हैं-निंदा, प्रशंसा, प्रश्न, समाचार, प्रार्थना, प्रत्याख्यान, उपालंभ, प्रतिषेध, प्रेरणा, सांत्वना, अभ्यवपत्ति, फटकार और अनुनय करना। इसके अतिरिक्त आठ भेद और भी हैं।वो हैं -प्रज्ञापन, आज्ञा,परिदान,लेख, परिहार,निसृष्टि,प्रावृत्तिक,प्रतिलेख और सर्वत्रग शासन पत्र।
एक राजा के लिये जो भी आवश्यक कर्तव्य और अधिकार होते हैं, आचार्य चाणक्य ने वे सब अर्थशास्त्र में कह दिये हैं। अध्याय,7/1 में दुश्मन के प्रति व्यवहार करने के लिये उन्होंने संधि,विग्रह, आसन,यान, संश्रय,द्वैधीभाव आदि छह को आवश्यक बतलाया है।विजय के इच्छुक राजा के लिये शत्रु के बलाबल, शक्ति, देश-काल,यात्रा काल,सेना की स्थिति, पीछे के राजाओं का आक्रमण, जनक्षय, धन व्यय, फलसिद्धि, बाहरी भीतरी आपत्ति आदि को विचारकर शत्रु पर आक्रमण करने को कहा है।अपना बल कम होने पर शांत बैठे रहने को कहा है। अध्याय 9/1 में भारत की सीमाओं को हिमालय से समुद्र तथा पूर्व से पश्चिम पर्यंत विस्तृत बतलाते हुये वो कहते हैं –
तस्य हिमवत्समुद्रांतरमुदीचीनं योजनसहस्रपरिमाणं तिर्यक् चक्रवर्तिक्षेत्रम्।
राष्ट्र,राजा,राजनीति,मंत्री,युद्ध,सेना, गुप्तचर, कर प्रणाली,दुश्मन, अर्थव्यवस्था आदि के संबंध में आचार्य कौटिल्य ने भी आवश्यक है,वह आज से हजारों वर्षों पहले कथन कर दिया है।देश विदेश में आज भी उनके अर्थशास्त्र का उतना ही महत्व है जितना अड़तीस सदी पहले था।
सन् 1469 ईस्वी में इटली में जन्मे मैक्यावली को यूरोप का चाणक्य कहा जाता है। हालांकि इस कथन में पूरी सच्चाई नहीं है। क्योंकि चाणक्य एक अर्थशास्त्री, कुटनीतिज्ञ,राजनीतिज्ञ, सफल,योग्य गुरु, सफल मंत्री मंत्री, शास्त्रवेत्ता,भविष्यद्रटा, युद्ध रणनीतिकार,लेखक के साथ- साथ एक धार्मिक और नैतिक व्यक्ति भी थे। मैक्यावली के जीवन में में उपरोक्त गुणों का पूर्णतः अभाव था। मैक्यावली ने केवल इटली की एकता का सपना देखा था, जबकि चाणक्य ने भारत में एकता और व्यवस्था स्थापित करने के सपने को हकीकत में बदलने में सफलता प्राप्त की थी। मैक्यावली को इटालियन राष्ट्रवाद का प्रेरक माना जाता है,जिसको इटालियन विचारक ही स्वीकार नहीं करते हैं। चाणक्य का जीवन संघर्ष, तपस्या और संयम का जीवन था, जबकि मैक्यावली का जीवन नैतिकतारहित,उच्छृंखल, संकीर्ण सीमित, उपयोगितावादी और स्वार्थपूर्ण था। मैक्यावली नैतिकता से भिन्न आत्मा को मानते थे, जबकि चाणक्य के लिये ऐसा नहीं था। चाणक्य ने व्यक्ति, समाज और राष्ट्र के जीवन में दैव और पुरुषार्थ दोनों के महत्व को माना है, जबकि मैक्यावली दैव की अपेक्षा मनुष्य को ही सब कुछ मानते हैं। कहते हैं कि खुले विचारों का ढिंढोरा पीटे जाने वाले यूरोपियन देशों में 150 वर्षों तक मैक्यावली के लेखन को कोई महत्व नहीं मिला था। इटली की अपेक्षा इंग्लैंड और फ्रांस में उनको अधिक महत्व दिया गया था। मैक्यावली की विचारधारा का प्रभाव इंग्लैंड के बुद्धिवादी विचारक बेकन तथा देकार्त पर पड़ा था। नीतिमुक्त,मूल्यमुक्त, करुणामुक्त और स्वार्थपूर्ण उपयोगितावादी राजनीति की शुरुआत अब्राहमिक फिलासफी में प्रारंभ से ही मौजूद रही है। मैक्यावली, बेकन, देकार्त, बैंथम, मिल, मैकाले, मैक्समूलर आदि ने कोई नयी राजनीतिक परिपाटी प्रदान नहीं की थी, अपितु यह सब तो यूरोप में पूर्व हेलेनिस्टिक, हेलेनिस्टिक तथा रोमन काल से ही चलती आ रही थी।
मैक्यावली सत्ता प्राप्ति के लिये कोई भी अनैतिक,अधार्मिक, संवेदनहीन, भावना रहित और अमानवीय व्यवहार करने के पक्षधर थे। आदर्श और यथार्थ में से उन्होंने यथार्थ का चुनाव किया था। उनके अनुसार सत्ता प्राप्ति के लिये किसी राजा को कितनी भी धोखाधड़ी, विश्वासघात,छल,हिंसा और कपट करना पड़ जाये-उसे करना चाहिये।उसे पीछे नहीं हटना चाहिये। नैतिक व्यवहार को उन्होंने एक राजा के लिये कमजोरी और कायरता कहा था।जीओ और जीने दो के उपदेश का उनके लिये कोई महत्व नहीं था।’साधन साध्य’ के संबंध में उनका स्पष्ट विचार था कि हिंसक, छलपूर्ण, कपटपूर्ण और धोखाधड़ी के साधनों को अपनाकर अपने राजनीतिक साध्य को कायम रखने में कोई बुराई नहीं है। वर्ष 2026 के शुरू में अमरीका द्वारा वैंजेयुवेला देश पर हमला करके वहां के राष्ट्रपति को गिरफ्तार करके जेल में डाल देना और वहां के अकूत तेल भंडार पर कब्जा कर लेना मैक्यावली के विचारों का ही अनुकरण है। इससे पहले पाकिस्तान, इराक, अफगानिस्तान, बांग्लादेश आदि देशों में भी इसी मैक्यावली के राजनीतिक सिस्टम को अपनाया जा चुका है।निज स्वार्थ के लिये कोई भी अनैतिक, अधार्मिक, अमानवीय, हिंसक और युद्धक कर्म करना पडे-उसे कर लेना चाहिये।
उनकी पुस्तक ‘द प्रिंस’ को पढ़ने से उपरोक्त जानकारी विस्तार से उपलब्ध है। दूसरे देशों में गृहयुद्ध करवाना,विरोधी सरकारों को गिराना,समर्थक सरकारों को पदस्थ करना, दूसरे देशों के संसाधनों पर कब्जा करना, दूसरे देशों पर अपने घटिया माल को जबरदस्ती से बेचना, विकासशील देशों को व्यर्थ हो चुके हथियारों और तकनीक को जबरदस्ती से बेचना, बहुराष्ट्रीय कंपनियों के माध्यम से उपभोक्ता बाजार पर कब्जा करना, खतरनाक बीजों को दूसरे देशों पर थोपना तथा युवा पीढ़ी को बर्बाद कर देने वाली उच्छृंखल शिक्षा प्रणाली को दूसरे देशों में लागू करना आदि सभी क्षेत्रों में मैक्यावली का राजनीतिक दर्शन काम कर रहा है।
………….
डॉ. शीलक राम आचार्य
दर्शनशास्त्र-विभाग
कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय
कुरुक्षेत्र – 136119

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