साहित्य

माँ की कृपा

डॉ गीता पांडेय अपराजिता

 

मिला मुझे सब कुछ है माता,मन आनंदित रहता है।
तुमको पाकर यह जीवन माँ,धन कुबेर- सा लगता है।।

इस जीवन का सार तुम्ही हो,अन्तस को सम्बल मिलता।
पड़ा शिथिल यह तन मन देखो,तेरे अंकन से हिलता।
तेरे चरणों मे ही मइया, सारा जग ये रमता है।।
तुमको पाकर——

पूर्ण समर्पित कर दी साँसे, मुझमें तुम्ही समाई हो।
तुमसे ही सारी आशाएँ, तुम ही मन को भाई हो।
द्वार तुम्हारे आकर ही माँ, जीवन सार्थक बनता है।।
तुमको पाकर——-

मैंने तुझको अपना माना, सारे जग को बिसराया।
पूर्ण हुई अब अवधि बिरह की , जबसे शुभ संयोग मिलाया।
सदा तुम्हारा मधुर मिलन यह, बिरही के दुख हरता है।।
तुमको पाकर——

जन्म-जन्म की पूँजी पायी, धन्य सफल जीवन मेरा।
मिला सहारा अनुपम मइया, करूँ ध्यान माता तेरा।
कान्ति चमकती मोती माणिक, स्वर्ण कोष भी सस्ता है।।
तुमको पाकर—–

मन मंदिर में तुम्हें बसाया, तुम बिना यह क्या जीवन?
जहाँ तुम्हारी सूरत दिखती, लगे वहीं पर अपनापन।
पल भर दूर नहीं रह सकती, मन मेरा यह कहता है।
तुमको पाकर——-

डॉ गीता पांडेय अपराजिता
रायबरेली-उत्तरप्रदेश

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