
अब धूप मेरे घर तक नहीं आती
ये ऊँची अट्टालिकाएँ और प्रदूषण राह रोक लेती हैं
सोचती हूँ दूर कहीं जाकर स्वच्छ समतल स्थान से
समेट लाऊँ आँचल में फाँड़ भर धूप।
एक अंजुलि बिखेर दूँगी गमले में
जिसमें बोए हैं प्यार के पौधे
जिससे वे पुष्पित पल्लवित हो सकें
और मोहेंगे मन मेरा नयन मेरे तृप्त होंगे ।
एक अंजुरी डालूंगी वर्षों पूर्व रखे
एल्बम पर जिसमें छोटे बड़े
लम्हें संजो रखे हैं
बदरंग से हो रहे हैं रखें- रखें।
एक अँजुरी डालकर रिश्तों को कुरकुराऊँगी
जो समय के अभाव में
अहम के प्रभाव से स्वार्थ के कोने में
पड़े- पड़े सील से गए हैं।
एक अंजुरी में खुद सेवन कर खुश करूँगी जेहन
खिली- खिली रहूँगी सजूँगी बालों में
किसी के गले का हार बनूँगी
शोभा बढ़ाऊँगी किसी के वस्त्र का
कभी ईश्वर के चरणों में पड़ भाग्य जगाऊँगी ।
हृदय वाटिका में खिले पुष्पों की
मनभावन खुशबू से
मन मंदिर सुभाषित करूँगी
हाँ! मैं जाकर आँचल भर धूप लाऊँगी।
डॉ.पुष्पा सिंह




