साहित्य

विश्वामित्र को शिष्य बन शरण दी

विद्यावाचस्पति डॉ कर्नल आदिशंकर मिश्र ‘आदित्य’

व्यापक अकल अनीह अज
निर्गुण नाम न रूप।
भगत हेतु नाना विधि,
करत चरित्र अनूप।

जो सर्व व्यापी हैं, निराकार हैं,
इच्छारहित, अजन्मा, निर्गुण हैं,
जिनका न नाम है न कोई रूप है,
वही भगवान भक्तों को प्रिय हैं।

जिनका अद्भुत, अलौकिक चरित्र है,
ऋषि विश्वामित्र के शिष्य श्रीराम हैं,
महाज्ञानी, महामुनि, पवित्र आश्रम है,
असुरों से त्रसित मुनि अति दुःखित हैं।

अनुज समेत श्रीराम जी को लेने,
विश्वामित्र अवध दरबार पधारे,
राजा दशरथ में स्वागत सत्कार
के साथ मुनिवर के चरण पखारे।

आने का प्रयोजन दशरथ में पूछा,
ऋषि विश्वामित्र ने प्रयोजन बताया,
सुनकर राजा दशरथ अति दुखी हुये,
तब गुरू वशिष्ठ जी ने उन्हें समझाया।

राम लक्ष्मण मातु पिता से विदा ले
मुनिवर के साथ उनके आश्रम देखा,
मार्ग में निसिचरी ताड़का को देख
श्रीराम ने एक वाण से मार गिराया।

प्रभु श्रीराम ने निसिचरी ताड़का को
दीन मानकर स्वर्ग धाम में जगह दी,
वे दीनन के दीनानाथ श्री रामजी थे,
विश्वामित्र को शिष्य बन शरण दी।

असुरों का विनाश कर ऋषय सर्व
समाज को निर्भय कर प्रसन्न किया,
जनकपुर सीता स्वम्बर समाचार पा
गुरु संग द्वौ भ्रात ने प्रस्थान किया।

विद्यावाचस्पति डॉ कर्नल
आदिशंकर मिश्र ‘आदित्य’
लखनऊ

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