
खामोशियों की चादर हटकर, चलो कुछ बात करते हैं,
सपनों के किसी कोने में, फिर मुलाकात करते हैं।
दिल के दबे अरमानों को, लबों पर आज आने दो,
कुछ तुम कहो कुछ हम कहें, सन्नाटे को जाने दो।
रिश्तो की इस उलझन को, साथ मिलकर सुलझाएंगे,
तुम थोड़ा सा करीब आओ, हम भी कदम बढ़ाएंगे।
वक्त की इस भाग दौड़ में दो पल सुस्ता लेते हैं,
यादों के पुराने पिटारे से, कुछ हंसी चुरा लेते हैं।
सफर लंबा है पर प्यारा अगर साथ तुम्हारा हो,
हर अंधेरी रात के बाद, फिर सवेरा नया हो।
अधूरे लफ्जों को पूरा करने की, बस एकगुजारिश है,
संग तुम्हारे जीने की, आकाश की यही ख्वाहिश है।
पंडित मुल्क राज “आकाश”
गाजियाबाद उत्तर प्रदेश



