साहित्य

गज़ल

मंजुला शरण "मनु"

न जाना है न देखा है उसी से दिल लगा बैठे
बड़ी मुश्किल हुई है ये कि ख़ुद को ही भुला बैठे।

मुकद्दर में लिखा था जो वही अब सामने आया
न तुम जाने न हम जाने किसे दिल में बसा बैठे

चुरा कर चैन मेरा तुम बने हो अजनबी ऐसे
कहेंगी धड़कने तुम से कि तुम भी दिल गवाँ बैठे ।

पिया जिसने मुहब्बत का नशा जाना उसी ने ये
कि मजनूँ और ये रांझा कहाँ ख़ुद को लुटा बैठे।

फ़रेबी जाल है दुनियाँ यहाँ मतलब भरे रिश्ते
उलझता है वही जो ग़ैर को अपना बना बैठे।

मंजुला शरण “मनु”
राँची, झारखण्ड़।

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