
धरा की कोख से हुआ जन्म।
सुघर थे जिनके सारे कर्म।।
बड़ी जब हुईं बढ़ी तब चाह।
ब्याह की चिंता दिखे न राह।।
जनक ने लिया प्रतिज्ञा ठान।
पूर्ण जब नही हुए अरमान।।
विनय तब करती सिया गणेश।
हरो सब जन आ सकल कलेश।।
हाथ में उठा तुरत लो चाप।
पिता का मिटे तभी संताप।।
लाज तुम आज बचा लो राम।
करूंँ मैं निशि दिन तुम्हें प्रणाम।।
जुटे हैं बड़े-बड़े बलवान।
दशानन बाणासुर ले स्थान।।
उठाकर शीश करें अभिमान।
मिटेगी जनकपुरी की शान।।
खींच लो धनुष चढ़ा तुम डोर।
ताकती निरत आपकी ओर।।
बँधा दो आर्य पिता को धीर।
बढ़ी है हृदय बहुत ही पीर।।
समझ लो मेरे मन की बात।
तुम्हें ही पूँजूँ मैं दिन-रात।।
बना है जन्म जन्म से साथ।
मुझे क्यों भूल रहे हो नाथ।।
भवानी तुम्ही रखो कुल लाज।
बने श्री राम हमारा साज।।
मांँगती यही मातु वरदान।
तुम्हीं से बनी सकल पहचान।।
हुई सुन बात मातु गंभीर।
दिया आशीष जगी तकदीर।।
तुरत गुरु नमन किए रघुनाथ।
मिला आशीष मंच शिव साथ।।
खींच कर डोर धनुष की राम।
तोड़कर किए जनक सुख धाम।।
बलवान सभी मानते हार।
राम के अग्र हुए लाचार।।
गूंँज तब उठी हुआ सत्कार।
पुरोहित वेद मंत्र उच्चार।।
सिया ने डाली तब जयमाल।
नगर के लोग हुए खुशहाल।।
किए नर नारि सभी जयकार।
धरा भी सज गई कर श्रृंँगार।।
देव भी करें सुमन की वृष्टि।
संत जन की हर्षित है दृष्टि।।
सखी सब करें पुष्प बौछार।
मातु हो मुदित गई बलिहार।।
पूर्ण जब हुई सिया की आस।
बढ़ा गौरी के प्रति विश्वास।।
अयोध्या नगर गया संदेश।
खबर शुभ मिली खुशी अवधेश।।
साज को सजा चली बारात।
जनक के द्वारा आय हरषात।।
ब्याहने चले संग सब भ्रात।
चार बहुएंँ पा हर्षित मात।।
खुशी छा गई नगर अतिरेक।
तीन सांँसें बहुएँ सब नेक।।
सिया ने झेला कष्ट अपार।
जानता है इसको संसार।।
धरा की गोद समाहित अंत।
कथा जग में बन गई अनंत।।
करे गीता है यह अरदास।
सिया के गुणों को रखो पास।।
डॉ गीता पांडेय *अपराजिता*
सलोन रायबरेली उत्तर प्रदेश
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