साहित्य
विनोद
पता अब चला है उस प्यार का
याद आती है कुछ कुछ,
होश आने के बाद की बात।
मां के हाथ का कौर,
मां भात दाल खिलाती थी,
कभी यह कह कर कि
यह है चिड़इया कौर,
यह है गइया कौर।
पता नहीं किन किन पक्षियों
व पशुओं के नाम पर
खिलाती थी।
अब वह नहीं है।
नहीं है उसका चित्र।
नहीं था गांवों या बाजारो में स्टूडियो।
आंखों में कभी कभी आती है
उसकी धुंधली आकृति।
लेकिन मैं नहीं उकेर पाउंगा
उसका स्वरूप।
है वह प्रकृति में समाहित।
निराकार देती रहती है
अपनी संतानों को शुभाशीर्वाद,
मन बेचैन हो जाता है
मां तुम्हे करके याद!
— विनोद–




