
पीर-पराई जिसने समझा, देव-दूत ही है जाना।
सब के दुख में व्यथित हुआ जो,नेक फरिश्ता पहचाना।।
अपना रोना ले जग बैठे,क्या समझे पीर-पराई।
अपनी पीड़ा ही क्षण-क्षण में,उसको है ख़ूब सताई।।
अपनी डफली बजती प्रति क्षण,अपना ही बजता गाना।
सब के दुख में व्यथित हुआ जो,नेक फरिश्ता पहचाना।।
लँगड़े को लाठी पकड़ाये,वृद्धों का शुभद सहारा।
अंधे को जो हाथ दिया वो, बच्चों पर जो सब वारा।।
काम दिया जो बुझे हुए को,भूखे को सँग दे खाना।
सब के दुख में व्यथित हुआ जो,नेक फरिश्ता पहचाना।।
हिम्मत जिसने सदा बँधाई,जीवन में लायी आशा।
नहीं भटकने कभी दिया जो,मानुष मन-गेह निराशा।।
ज्योत बने जो झिलमिल करता, ईश्वर का सुत ही माना।
सब के दुख में व्यथित हुआ जो,नेक फरिश्ता पहचाना।।
वर्तिका अग्रवाल ‘वरदा’
वाराणसी




