साहित्य

हमसफ़र

ममता झा मेधा

जीवन के अनमोल पल को ,
अपने मन में सपने सजाती।
पन्ने पलट पलट कर नजरें,
शब्दों से आँखें लड़ाती।
ज़िन्दगी यूँ ही कटता गया,
सफर भी यूँ ही चलती रही।
जाने कब हमसफ़र मिल गया,
अक्षरों की परछाइयों में खोई हुई।
किताब ज़िन्दगी बन जाती है,
दिलचस्पी ओ उत्सुकता बढाती है।
वीरान और बेरंग सफ़र को,
रंगों सा रंगीन हमसफ़र बनाती है।
किताब हर सफर में,
हमसफ़र बन जाती है।
मन में नई उमंग जगाती है,
लिखने के लिए उकसाती है।
मन में शब्द के बूंद फूट रहे,
कलम चलाने को व्याकुल हो रहे।
मन में एक तरंग सा उठता,
यूँ ही उम्रभर लिखती रहूँ।
तुमसे अब क्या माँगू ऐ खुदा,
तुने तो जीने का सबब दे दिया।
सारे दर्द ओ आँसू ले लिए,
एक किताब तुम पकड़कर गए।
खत्म ना हो कभी ये सफर,
लिखती रहूँ मैं उम्र भर।
मिल गया मेरा हमसफ़र,
जो मरने के बाद भी रहे अमर।।
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ममता झा मेधा
डालटेनगंज

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