साहित्य

सा़धक

डॉ गीता पांडेय "अपराजिता"

साधक करके साधना, सीखें छंद विधान।
सतत् लेखनी है चले,पाकर गुरु से ज्ञान।।
पाकर गुरु से ज्ञान,प्रखर क्षमता है बढ़ती।
करे तिमिर का नाश, बुद्धि को जाग्रत करती।।
गीता जोड़े हाथ,बनी गुरु की आराधक।
भरता दिव्य प्रकाश, साधना रत जो साधक।।

आलोकित पथ को करें, सही गलत पहचान।
राह दिखाते सत्य की गुरुवर बड़े महान।।
गुरुवर बड़े महान,हृदय पावन कर देते।
साधक जो भी शिष्य , शरण गुरु अपनी लेते।।
गीता करती भूल, उसे करते संशोधित।
जला ज्ञान की ज्योति, जगत करते आलोकित।।

सच्चे साधक जो बने, करते प्रभु से प्रीति।
सत्य धर्म की राह चल, निभा रहे शुचि नीति।।
निभा रहे शुचि नीति,त्याग तप उर में धारे।
प्रभु करते भव पार,कर्म जब लगते प्यारे।।
कहती गीता बात,बंध रखना मत कच्चे।
डोर रहे मजबूत, तभी रिश्ते हो सच्चे।।
डॉ गीता पांडेय “अपराजिता”
सलोन रायबरेली उत्तर प्रदेश

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button
error: Content is protected !!