साहित्य

कुछ पलों का यह जीवन

डाॅ सुमन मेहरोत्रा

कुछ पलों का यह जीवन, क्षणभंगुर सी कहानी,
रेत की मुट्ठी जैसा, फिसलती जाती जवानी।
सुबह की ओस सा चमके, शाम ढले खो जाए,
पल में हँसी बन मुस्काए, पल में आँसू बो जाए।

समय की धारा बहती, रुकने का नाम न ले,
जो मिला है आज हमें, कल वही अनजान मिले।
सपनों की नन्ही कोंपल, धूप में भी पलती है,
ठोकर खाकर राहों में, हिम्मत और निखरती है।

रिश्तों की डोर सहेजें, शब्दों में स्नेह भरें,
रूठे मन को मनाने में, अहंकार से दूर रहें।
जो है पास उसी को, दिल से अपनाना सीखें,
पल-पल में जीवन का, सच्चा अर्थ पहचानें।

न दौलत साथ चलेगी, न पद का होगा मान,
कर्मों की सुगंध ही देगी, अंत समय पहचान।
इसलिए हर क्षण को जी लें, प्रेम की भाषा में,
क्षमा, करुणा, विश्वास रखें, जीवन की परिभाषा में।

कुछ पलों का यह जीवन, अनमोल उपहार है,
इसे सँवारें अपने हाथों, यही सच्चा सार है।
आज में जीकर मुस्काएँ, कल की चिंता छोड़,
क्षणिक जीवन में रच दें, मानवता का उजास।

डाॅ सुमन मेहरोत्रा
मुजफ्फरपुर, बिहार

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