
जब धरा के अंक में,करता रवि अठखेलियाँ ।
तब चमक उठते शिखर है,और पर्वत श्रेणियाँ |
जब नवल अरुणिम सी किरणें,अवनि का करती आलिंगन ।
नदियों की धारा से मिलती, जैसे हो सहेलियाँ॥
तब तृणों की नोकों पर, हिमबिन्दु मोती से चमकते । सीप के मुक्तक भरी ज्यों, हाथों की हथेलियाँ॥
वो भास्कर धरा पर आकर, यूँ आस का उजास लाता ।
रात की ज्यों उलझी-उलझी, सुलझी हो पहेलियाँ॥
विनीता चौरासिया
शाहजहाँपुर उत्तर प्रदेश




