
अच्छा करने वाला पुरुष ठीक ढंग से
कपड़े नहीं साफ कर सकता है
ठीक से रोटियां नहीं बना सकता है
सब्जी में नमक ज्यादा डाल देता है
पूरी रसोई अस्त-व्यस्त कर देता है
सारा सामान बिखेर देता है
ठीक से झाड़ू नहीं लगा पाता है
ठीक से बर्तन नहीं मांज पाता है
घर का काम पुरुष कर नहीं पाता है
करता है तो जल्दी थक जाता है
औरतों पर हुकुम चलाता है पुरुष
कहता है दिनभर करती क्या हो ?
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जयचन्द प्रजापति ‘जय’
जैतापुर, हंडिया, प्रयागराज
कविता का भावार्थ.. यह कविता जयचन्द प्रजापति ‘जय’ द्वारा रचित व्यंग्यात्मक रचना है, जो पुरुषों के घरेलू कार्यों में अक्षमता और महिलाओं पर अत्यधिक हुकुम चलाने की विडंबना को उजागर करती है।
कवि कहते हैं कि अच्छा करने वाले पुरुष भी कपड़े साफ करने, रोटी बनाने, सब्जी में नमक संतुलित रखने या रसोई को व्यवस्थित रखने जैसे साधारण काम ठीक से नहीं कर पाते। वे झाड़ू लगाने, बर्तन मांजने में असफल रहते हैं, घर अस्त-व्यस्त कर देते हैं और थोड़े काम से ही थक जाते हैं। फिर भी, वे महिलाओं पर हुकुम चलाते हैं और पूछते हैं कि वे दिनभर करती क्या हो?
इस प्रकार, कविता लिंग-भेदभावपूर्ण सामाजिक धारणाओं का खंडन करती है, पुरुषों की दोहरी नैतिकता को चित्रित कर महिलाओं के अथक श्रम की सराहना करती है।




