
मृत्यु मेरी मित्र है, जीवन की सहचर है,
डर की धुंध हटाकर सच का सुंदर घर है।
जब थक जाएं पाँव मेरे राहों की धूल में,
वो सहला दे मस्तक को शांत शीतल फूल में।
मृत्यु मेरी मित्र है, अंत नहीं विश्राम है,
एक नए सवेरे का बस मधुर सा नाम है।
जब जग के शोर में मन टूटने लगे,
वो चुपके से आकर मुझको छूने लगे।
कहती है— “मत घबराना, मैं अंधियारी नहीं,
मैं तो बस इक दहलीज़ हूँ, लाचारी नहीं।”
जीवन की इस नाव को पार लगाती है,
कर्मों की गाथा फिर आगे बढ़ाती है।
मृत्यु मेरी मित्र है, सच्ची हमराज़ है,
झूठे सारे बंधन तोड़े, वही तो आगाज़ है।
हँसकर उसका स्वागत कर, ऐसा मन बनाऊँ,
हर श्वास में सच्चाई का दीप जलाऊँ।
जब भी आए वो क्षण अंतिम रात का,
गीत गुनगुनाऊँ मैं प्रभु के साथ का।
मृत्यु मेरी मित्र है, भय का कोई नाम नहीं,
जीवन का ही दूसरा रूप है—अंजाम नहीं।
कुलदीप सिंह रुहेला
सहारनपुर उत्तर प्रदेश।




