
तुम थी तो
सब कुछ था
अब जब तुम नहीं हो
तो सब कुछ
कैसा लगता हैं
पेड़ों की खामोशी
आकाश का भव्य रूप
नदी का सूखापन
पक्षियों का शोर
चलते भागते
राहगीर की तनाव लिए
चेहरे , भागती गाड़ियों का
शोर, घर,आंगन की
चोखट कुछ भी तो
अच्छा नही लगता हैं
सब को न जाने क्यों
अब जैसे मुझे चिड़ा रहे हैं
मेरे मज़ाक बना रहे हैं
कितना कुछ नर्भर होता हैं
इस तुम पर
पता नहीं कितना अथाह
प्यार, प्रेम, अपनत्व और
आनंद देता,जीने का सुकून है
यह शब्द जो
शब्द कहां है
जैसे ईश्वर रुप है
इस मात्र दो शब्द में
समाहित
सचमुच तुम हम
तुम ही है जो
आज भी जिंदा रखें हैं
सभी को मानव मात्र पशु पक्षी सभी प्राणियों को
सब कुछ सुख सुकून
हर कोई के,तुम, पर
टिका हुआ है
यह परम सत्य की
अहसास तब होता हैं
जब तुम नहीं होता है
मेरा नसीब है यह कि
तुम हां तुम
न होकर भी सदा ही
तुम , बनी हुई हो
मेरे ख्याल में
दिल और दिमाग में
सृजन लिए
सैकड़ों कृतियों को
जन्म देती
इसे बड़ी बात क्या होगी
इस तुम शब्द की
महत्ता के लिए कि
तुम कभी मरता नहीं
चाहिए तुम के प्रति आस्था और विश्वास सदा ही
आदर और सम्मान
सदा ही ईश्वर तुल्य
आराधना, पूजा,अर्चना
प्रणाम करता हूं
ईश्वर तुल्य,तुम , को
तुम हो सदा साथ
पास, हर पल
बहुत बहुत है
शेष जीवन सार्थक
करने में
वंदन सत् सत् वंदन
तुम,को
डॉ रामशंकर चंचल
झाबुआ मध्य प्रदेश
परम शक्त ईश्वर कृपा हो कि
इस, तुम हो भाग 7,के
साथ मेरा एक और
सकारात्मक सोच और चिंतन लिए सदा स्वस्थ और प्रसन्न रखें ऊर्जा और ताकत प्रदान करता
खंड काव्य,का निर्माण हुआ
प्रणाम ईश्वरीय रूह को सत् सत् प्रणाम




