शैतान का कोई दीन ए इमान नहीं होता
होता अगर तो वह शैतान नहीं होता
उसके चेले रोज मनाते है दिवाली यहां
उसके यहां कभी भी रमजान नहीं होता
इमान ने परिवार नियोजन किया है यहां
शैतान जैसा बड़ा खानदान नहीं होता
ऊंची इमारतो में मिलते आसानी से यहां
आदमी खास होता हैं आम नहीं होता
मीठी जुबान लिए मिलता है चारों तरफ
वह कभी भी कड़वी जुबान नहीं होता
पैसा बनाता है बस सबको अपना यहां
पैसा ही है जो कभी बेईमान नहीं होता
ईमान वालों की घट रही रोज संख्या यहां
इनका दीदार इतना आसान नहीं होता
लोग हो जाते अगर समय के पाबंद इतने
तो मस्जिदों से कई बार अजान नहीं होता
गरीबी तोड़ कर रख देती है आदमी को
शायद इनका कोई भगवान नहीं होता
पंडित पुष्पराज धीमान भुलक्कड़
गांव नसीरपुर कला हरिद्वार उत्तराखंड
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