साहित्य

बाल कहानी- होली है

डॉ ऋतु अग्रवाल

चीकू खरगोश अपनी माँद में से निकलने को ही तैयार नहीं था। उसने बीती रात को ही आठ-दस गाज़रें अपनी माँद में ले जाकर रख ली थीं ताकि उसे अगले दिन बाहर ही नहीं निकलना पड़े।
“चीकू! बाहर आओ बेटे। तुम्हारे मित्र आए हैं।” चीकू की मम्मी चिकी ने आवाज़ लगाई।
‌‌ “मम्मी! मेरे पेट में बहुत दर्द है। मुझे सोने दो।” चीकू ने कराहते हुए जवाब दिया।
“अरे! तो तुमने बताया क्यों नहीं? मैं सुखन बंदर वैद्य जी को बुलाकर तुम्हें दवाई दिला देती।” चिकी ने घबराते हुए कहा।
“नहीं! मुझे दवाई नहीं चाहिए। मुझे सोने दो। मैं शाम तक ठीक हो जाऊँगा।” चीकू ने मरे हुए स्वर में कहा।
“अरे,चिकी! तुम चीकू को परेशान मत करो। उसे सोने दो। आओ, हम सब होली खेलते हैं। बच्चों! चीकू नहीं खेल रहा होली तो कोई बात नहीं, तुम सब मुझे और अपने आंटी को रंग लगा लो।” मीकू खरगोश ने आँख दबाते हुए कहा। बच्चे और चिकी इशारा समझ गए।
“और मुझे भी!” चीकू की बहन मिकी ने कहते हुए पानी के गुब्बारे चीकू के मित्रों को मारने शुरू कर दिए।
सबने खूब होली खेली।
“अच्छा, अंकल! अब हम चलते हैं।”चीकू के मित्रों ने कहा।
“अरे ऐसे कैसे? चिकी तुमने जो रबड़ी, फ्रूट क्रीम, गुजिया, दही-बड़े बनाए हैं, ज़रा बच्चों को तो खिलाओ।”मीकू ने कहा।
” हाँ जी! अभी लाई।”कहकर चिकी और मिकी ने व्यंजन परोसने शुरू कर दिए।
व्यंजनों की तारीफ़ सुन और चटखारों की आवाज़ें माँद में नाटक कर रहा चीकू भी सुन रहा था। उसके मुँह में पानी आ रहा था पर मरता क्या न करता? अपने सुंदर, सफेद, रोयेंदार बदन को रंग से बचाने के लिए पेटदर्द का नाटक जो किया था इसलिए चुपचाप पड़ा रहा। पर ज्यादा देर तक सब्र करना उसके लिए मुश्किल था।
धीरे-धीरे मित्रों की आवाज़ें आनी बंद हो गईं। शायद सब चले गए हैं, यह सोचकर चीकू माँद से बाहर निकला।
“मम्मी! अब मेरा पेटदर्द ठीक है। आपने जो व्यंजन बनाए हैं, वह मुझे भी तो खिलाओ।” चीकू ने होंठों पर जीभ फेरते हुए कहा।
” हाँ! हाँ! क्यों नहीं? पर पहले रंग तो लगवा लो।” कहते हुए चीकू के मित्रों ने रंगीन पानी की बाल्टी चीकू के ऊपर उँडेल दीं और नीला, पीला, काला सब तरह का रंग चीकू के शरीर पर पोतकर उसे चितकबरा कर दिया।
चीकू रोने लगा।
“हाय! मेरा सफेद, कोमल बदन इन दुष्टों ने खराब कर डाला।” चीकू चिल्लाने लगा।
“चीकू बेटा! ऐसे नहीं करते। यह शरीर तो धुल जाएगा पर तुम्हारे मित्र अपनी खुशी तुम्हारे साथ बाँटने बार-बार नहीं आएँगे। हमारे त्यौहार मनाए ही इसलिए जाते हैं ताकि सब एक-दूसरे से मिलें । ऊँच-नीच, छोटा-बड़ा सब भूलकर एक हो जाए।”मीकू पापा ने कहा।
“अच्छा! ऐसी बात है। होली है!” कहकर चीकू ने अपने दोस्तों को रंग लगाना शुरु कर दिया। फिर तो क्या चीकू और क्या उसके मित्र, सब नीले-काले हो भीगते हुए काँप रहे थे और दही- बड़ो का आनंद ले रहे थे।

डॉ ऋतु अग्रवाल
मेरठ, उत्तर प्रदेश

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