साहित्य

मजमा

राजीव त्रिपाठी

चेहरा छुपा रही है हमसे ज़िन्दगी
क्या-क्या दिखा रही है हमें ज़िन्दगी!!
जिससे वफ़ा की थी उम्मीद
ग़ैर के साथ जा रही है ज़िन्दगी!!
वादा वफ़ा की किताबी बातें,
हमको पढ़ना सीखा रही है ज़िन्दगी!!
कैफ़ियत से हम भी काम लेते हैं
फिर से संजीदा बना रही है ज़िन्दगी!!
हम तो सारे वक़्त के साथ खड़े हैं
बे-वजह आईना दिखा रही है ज़िन्दगी!!
नशा कैसा भी हो बहुत बुरा है
नशे में खुद नज़र आ रही है ज़िन्दगी!!
दोस्त बनकर दग़ा दे रहे हैं मेरे सारे
ज़ख़्म पर मरहम लगा रही है ज़िन्दगी!!
आपकी दुआ से सभी अच्छा है लेकिन
हम पर तोहमत लगा रही है ज़िन्दगी!!
दुनिया जहांँ की फ़िक्र है हमको
बहुत से चेहरे दिखा रही है ज़िन्दगी!!
लोग हमें पसंद ही नहीं आए
फिर भी मजमा लगा रही है ज़िन्दगी..!

– राजीव त्रिपाठी
उदयपुर राजस्थान

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