
चंचल निर्मल सा था -वो
हरदम उड़ता रहता था वो,
पवन सरीखा सा था वो
बहती नदी सा था -वो ,
कभी चाँद सा शीतल बनकर
चपल चाँदनी संग लहराता,
कभी वो सुमनों के संग मिलकर
सम्पूर्ण जगत को महकाता फिरता,
बहती नदी सा आवारा था -वो,
लाँघ कर पर्वत दरिया को वो
सीमाओं के पार भी जाता,
कुछ खट्टे कुछ मीठे लम्हों को
कैद कर अपनी मुट्ठी में -वो,
अपने प्रियजनों को अहसास कराता
बहती नदी सा आवारा था -वो,
उसमें भी थी भरी भावना
भावों में बह जाता था -वो,
तभी तो तन्हाई की रातों में वो
बैठ कर तारों के आँचल में
शबनम संग मोती बिखराता है,
बहती नदी सा आवारा था -वो,
सबका प्यारा निर्मल पवन था वो,
बहती नदी सा निर्मल सा था वो…||
शशि कांत श्रीवास्तव
डेराबस्सी मोहाली, पंजाब



