साहित्य

गीत सार छंद

डॉ गीता पांडेय अपराजिता

दिल में घाव करे यह हरपल, खंजर चले दुधारी।
बड़ी तीक्ष्ण होती है भैया, मुख की शब्द कटारी।।

रखें नियंत्रण शब्दों पर, मीठी वाणी बोलें।
शब्दों की महिमा को समझे,नहीं कलुषता घोलें।।
नहीं बाद में पछताओगे, धधकी यदि चिंगारी।
बड़ी तीक्ष्ण होती है भैया, मुख की शब्द कटारी।

शब्दों से हमला यदि होता दिल छलनी हो जाता।
शांत समंदर हलचल मचती, दंगे भी करवाती।।
बाद चुकानी पड़ती इसकी, कीमत मानो भारी।।
बड़ी तीक्ष्ण होती है भैया, मुख की शब्द कटारी।।

हथियारों से ज्यादा घातक, लगती जैसे गोली।
पल में भीषण युद्ध कराती, सदैव कड़वी बोली।।
रिश्ते नाते सभी बिगाड़े, जिह्वा यही हमारी।
बड़ी तीक्ष्ण होती है भैया, मुख की शब्द कटारी।।

मन का दुख भी कम हो जाता,घाव भरे हैं सारा।
रसना रखो सम्हाल सदा ही, बढ़ता भाईचारा।
विद्वत जन यह बातें कहते, समझो दुनियादारी।
बड़ी तीक्ष्ण होती है भैया, मुख की शब्द कटारी।।

अपनत्व भरी वाणी से ही, संकट सभी भगाएँ।
प्रेम भाष्य है चरणामृत सा, सबको पान कराएँ।

समरसता के भावों से ही, महके उर फुलवारी।
बड़ी तीक्ष्ण होती है भैया, मुख की शब्द कटारी।।

डॉ गीता पांडेय अपराजिता
सलोन रायबरेली उत्तर प्रदेश

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button
error: Content is protected !!