साहित्य

समय की नदी

सौ, भावना मोहन विधानी

समय की नदी पूरे वेग के साथ आगे बढ़ती जा रही है,
और मैं पुरानी बातों को दिल से लगायें वहीं खड़ी हूं।
दिन महीने साल बीतते जा रहे हैं इस जीवन के,
और मेरा शरीर आज भी रुक गया वहीं कहीं पे।

कहते हैं बीती बातों को भूलकर समय के साथ आगे बढ़ो,
पुराने जख्मों को मरहम लगाकर अपना नया रूप गढ़ो।
पर मन है की पुरानी बातों से आजाद नहीं होना चाहता,
समय आगे बढ़ रहा है और वह खुद को वहीं खड़ा पाता।

हर शख्स की जीवन में आज यही कहानी है,
दिल में दर्द भरा है अथाह और आंखों में पानी है।
तोड़कर इन बंधनों को दिल मुक्त होना चाहता है अब,
समय के साथ चलकर पा लेना चाहता है खुशियां सब।

उठो, और अपने सपनों को एक नया आसमान दो,
खुलकर जियो और अपनी जिंदगी को एक नया नाम दो।
जीवन को पुरानी बातों में उलझा कर खोना नहीं है,
अपने हौसलों पर विश्वास रखो जिंदगी में अब रोना नहीं है।

सौ, भावना मोहन विधानी ✍🏻❤️
अमरावती महाराष्ट्र।

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