साहित्य

मन की अलमारियाँ

सुमन बिष्ट

कौन कहता है कि सीने में
अलमारियाँ नहीं होतीं,
यहाँ तो सुख-दुख की
अनगिनत फाइलें संजोई होतीं।

कुछ फाइलों में हँसी की धूप,
कुछ में आँसुओं की रातें हैं,
कुछ पन्नों पर यादों के फूल
कुछ में बिछड़ने की बातें हैं।

कभी कोई पुरानी फाइल खुलती
तो मन भीग सा जाता है,
बीते लम्हों का हर अक्षर
फिर से दिल को छू जाता है।

कुछ दर्द हमने सहेज रखे
चुपचाप दिल के कोनों में,
कुछ खुशियाँ भी मुस्काती हैं
यादों की मीठी सोहबतों में।

जीवन की ये अलमारियाँ ही
हमारी कहानी कहती हैं,
जहाँ हर फाइल में छुपी
एक अधूरी सी दास्तां रहती है।

शायद इसी संग्रह का नाम
जीवन का अनुभव होता है,
जहाँ हर सुख-दुख से मिलकर
मन थोड़ा परिपक्व होता है।

सुमन बिष्ट, नोएडा

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