
एक पेड़ सूखा सा खड़ा है मेरे आँगन में,
कौन कहता है सिर्फ बच्चे अनाथ होते हैं।
कभी इसी आँगन में सुबहें गुनगुनाती थीं,
दादी की लोरियाँ हवाओं में मुस्कुराती थीं।
दादा की चौपाल, पिता की हँसी, माँ की पुकार,
हर डाली पर खुशियों की चिड़ियाँ चहचहाती थीं।
रक्षाबंधन की राखियाँ यहीं बँधती थीं,
होली की हँसी, दीपों की पंक्तियाँ यहीं सजती थीं।
हर त्योहार इस पेड़ की छाया में उतरता था,
आँगन की मिट्टी भी जैसे आरती रचती थी।
फिर समय ने धीरे-धीरे करवट बदल ली,
दादी की कहानी, दादा की साँसें थम चलीं।
एक-एक कर घर के बुज़ुर्ग विदा होते गए,
दीवारों पर बस उनकी तस्वीरें रह गईं।
बेटे रोज़गार की राहों में शहर चले गए,
बेटियाँ अपनी-अपनी डोली में ढल गईं।
जो लौटने का वादा करके निकले थे कभी,
उनकी राह तकते-तकते ऋतुएँ बदल गईं।
जिसने तपती धूप में सबको छाया दी,
आँधी में भी घर की साँसों को बचाया था।
आज उसी पेड़ की जड़ों में प्यास उतर आई,
किसी ने एक लोटा जल भी न चढ़ाया था।
पंछियों ने भी बदल लिए अपने बसेरे,
सूनी डालों ने पहन लिए मौन के घेरे।
अब न झूले झूलते हैं, न बच्चों की किलकारी,
सन्नाटे गिनते रहते हैं दिन, महीने और फेरे।
आँगन की तुलसी भी सूनी-सूनी रहने लगी,
चौखट की हँसी भी जैसे कहीं खोने लगी।
जिस घर में हर साँझ दीपक मुस्कुराता था,
वहीं उदासी स्थायी मेहमान होने लगी।
फिर एक दिन ताला भी जंग खाकर रो पड़ा,
दरवाज़ा अपनों की आहट को तरसता रह गया।
पेड़ की सूखी शाख ने जैसे इतना ही कहा—
“क्या मेरा अपना कोई भी नहीं रह गया?”
वर्षों बीत गए…
न किसी ने छाल सहलाई, न जड़ों को जल मिला।
जिस हाथ ने इसे रोपा था, वह भी मिट्टी में सो गया,
जिसने इसकी छाँव में बचपन जिया, वह भी कहीं खो गया।
और अंततः…
पेड़ ही नहीं सूखा था,
रिश्तों का हर सोता सूख गया था।
जिस आँगन में कभी जीवन बहता था,
वहाँ प्रेम का अंतिम झरना भी रुक गया था।
एक पेड़ सूखा-सा खड़ा है मेरे आँगन में,
कौन कहता है सिर्फ बच्चे अनाथ होते हैं।
अनाथ तो घर भी होते हैं,
आँगन भी होते हैं,
पेड़ भी होते हैं,
और कभी-कभी… पूरा परिवार भी अनाथ हो जाता है।
स्वरचित मौलिक
कवि दिनेश पाल सिंह ‘दिव्य’




