
अभी रूठे हो तो मान जाओ
ज़िन्दगी बार-बार मौक़ा ना देगी!!
वक़्त रहते सुधर जाओ
ज़िन्दगी बार-बार मौक़ा ना देगी!!
अभी उल्फ़त का नशा,
सर चढ़कर बोल रहा है!!
वक़्त रहते ठहर जाओ
ज़िन्दगी बार-बार मौक़ा ना देगी!!
क्यों ताने देना बार-बार लोगों को
थोड़ा तो उन पर तरस खाओ
ज़िन्दगी बार-बार मौक़ा ना देगी!!
अभी रुसवाई का डर है शायद
ठोकर मोहब्बत में ना खाओ,
ज़िन्दगी बार-बार मौक़ा ना देगी!!
क्यों ग़ैर के ग़म में खुशी ढूंँढना
मिल जाए फिर भी पछताओ,
ज़िन्दगी बार-बार मौक़ा ना देगी!!
ज़िद बहुत है ख़ुदा को ढूंँढने की
किसी के दिल में आ जाओ,
ज़िन्दगी बार-बार मौक़ा ना देगी!!
स्वरचित- राजीव त्रिपाठी
उदयपुर राजस्थान




