साहित्य

कहानी : पंछियो का दाना पानी

संजय कुमार

एक मैं ऑफिस से घर आया और मेरी बेटी आठ साल की एक गिलास पानी लायी मेरी बेटी मुझसे बोली” पापा आज स्कूल में क्या बड़ा हादसा हो गया “मैंने पूछा” बेटा क्या हादसा हो गया है “मेरी बेटी ने बताया कि हमारे स्कूल के पेड़ से एक चिड़िया का बच्चा गिर गया जो बहुत घायल हो गया था उसे किसी ने घायल कर दिया था हमारे सर ने उसको दवा लगाकर फिर से पेड़ पर रख दिया और हम बच्चों ने बड़े खुश हो गए और हमारे सर ने बताया कि पंछी भी हमारे जैसे होते हैं इनको भी दाना पानी की जरुरत पड़ती है उनके लिए हमेशा दाना पानी रखना चाहिए और पंछियो के लिये घोंसले रखने चाहिए मैंने अपनी बेटी की बात सुनकर कहां “आपके सर नें सही बात बताई हैं हमेशा में पंछियों का ख्याल रखना चाहिए उनके लिए दाना पानी रखना चाहिए घर भी बनाना चाहिए ” मेरी बेटी बोली ” पापा हम भी अब पंछियो की सेवा करेंगे ” बेटी की बात सुनकर मैं अपने बचपन में खो गया मेरे बचपन में हमारे घर में एक आंगन में नीम पेड़ था उसे पेड़ की डाल बहुत सारे पंछी अपना घोंसला बना लेते और पेड़ की डालियो पर पंछियों की चहचाने आवाज आती थीं हमें बहुत अच्छा लगता था हम उनके लिए रात की बची हुई रोटियां और चावल और बाजरा रखते थे और मिट्टी के सकोर में पानी रखते थे बड़ा अच्छा लगता था जब हम पंछियो का दाना पानी रखते तो हमारे पापा बहुत खुश होते हैं फिर फिर हम बड़े हो गए अपने शहर आ गए नौकरी में सब कुछ भूल गए आज बेटी ने सब याद दिला दिया हमने बेटी से फिर कुछ नहीं कहा,फिर दूसरे दिन जब हम ऑफिस से घर आए तो हमारे पास पंछियो के लिए पानी रखने के लिए चार मिट्टी के कटोरे और पंछियो के लिये बने हुए चार घोंसले लेकर आए उन को देखकर मेरी बेटी बड़ी खुश हुई मैं और बेटी ने घर की छत पर बनी बालकनी की दीवारों पर उनको लगा दिया और मिट्टी के बर्तनों में पानी को भरकर रख दिया पंछियो के खाने के लिये दाना मिट्टी के बर्तनों में रख दिया कुछ के बाद छोटे-छोटे पंछी आने लगे धीरे-धीरे करें पंछियों ने घोंसले में घर बना लिया अब गौरैया चिड़िया भी आने लगी अब धीरे-धीरे पंछियों की संख्या बढ़ने लगी सुबह होते बहुत अच्छा लगने लगा हैं मेरी बेटी सुबह पंछियो के लिए दाना पानी रखती हैं सच घर में पंछियों की आवाज कितनी सुंदर लगती है और मेरा बचपन और मेरी बेटी का बचपन दोनों एक जैसे हो गये…..
……… लेखक संजय कुमार आगरा………

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