साहित्य

गौरैया रानी

सुमन बिष्ट

  • विश्व गौरैया दिवस के अवसर पर

छोटे-छोटे पंखों वाली, वो प्यारी सी पहचान,
कभी हर आंगन में गूंजती थी, उसकी मीठी तान।
सुबह की पहली किरण संग, चहचहाती थी वो,
गौरैया रानी बताओ हमसे क्यों रूठी हो?

छतों के कोने, बागीचों के छोटे-छोटे पेड़ ,
उसके सपनों के घर, वो बुनती ख्वाब अनेक।
पर कंक्रीट के जंगलों ने सब कुछ बदल दिया,
उसके आशियाने को हमने ही छीन लिया।

ना अब वो दाना मिलता है, ना पानी की धार,
मोबाइल की तरंगों ने कर दिया उसे लाचार।
वो प्रकृति की साथी, अब लुप्त होने को है,
हमारी ही लापरवाही का ये दुखद संयोग है।

आओ फिर से मिलकर हम, एक नई शुरुआत करें,
अपनी छतों पर दाना-पानी उपलब्ध करें।
फिर छोटे-छोटे घोंसलों से वो हमारा घर सजाएं,
हरियाली के संग हम, उसका विश्वास जगाएं।

गौरैया की चहचहाहट फिर से गूंजे हर द्वार,
यही हो हमारी कोशिश, यही हो सच्चा प्यार।
विश्व गौरैया दिवस पर लें ये दिल से प्रण,
बचाएं इस नन्ही जान को, तभी होगा उनका संरक्षण।

स्वरचित मौलिक रचना
सुमन बिष्ट, नोएडा

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