साहित्य

कविता

अवधेश कुमार श्रीवास्तव

कविता मेरा जीवन है, कविता में बसती जान है,
विधा आदि से नहीं मोहब्बत, मां पूजा ही अरमान है,
जो भी देखूं या फिर भोगूं, कविता में गाने का मन करता
लिखता और संकलित करता, स्वान्तसुखाए का मान है।।

कविता वह पावन सरिता है,जो भावों को निर्मल करती,
कविता वह पावन सविता है,जो कलुष प्रकाश मय करती,
कविता कभी ठिठोली बनती,कभी मस्खरी करती,
पर फूहड़ पन बर्दास्त नहीं,मन चाहा रस पढ़ती।।

मन के भावों को शब्द संधि में,भाषित करती है कविता
उल्लास और दुःख दर्द सभी परिभाषित करती है कविता
प्रकृति प्रेम, सौंदर्य जगत का,दर्शन करवाती है कविता
टूटे और सुसुप्त मनो का,फिर मिलन कराती है कविता।।

कविता लिखी नहीं जाती, बल्कि जीनी पड़ती है
सांसों संग घुले शब्द में इसे गानी पड़ती है,
कभी क्रांति बीज निरूपित करती,यह ओजस्वी वाणी में
कभी दर्द लिखे गर भाव में फंसकर,नैनों से गंगा बहती है।।

कविता सुधार भी लाती है,जिससे अवरोध खत्म होते
कविता से शासन भी डरता, होशियार सभी हरदम होते,
कहीं चूक अगर हो जाती है आगाह कवी ही करता है,
कविता कहने का माध्यम है,शिकवा जो खत्म नहीं होते।।

अवधेश कुमार श्रीवास्तव उन्नाव उत्तर प्रदेश

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button
error: Content is protected !!