साहित्य

माँ का नाम

कवयित्री ज्योती वर्णवाल

खुद भूखी रहकर भी वो, पहले सबको खिलाती है,
थकती नहीं वो ममता की मूरत, खुशियाँ चुन-चुन लाती है।

सलाम है उसकी हिम्मत को, जो हर बाधा सह जाती है,
बिटिया के सम्मान की खातिर, माँ दुनिया से लड़ जाती है।*

राह में आते कांटे जो भी*, फूल बना वह देती है,*
वो चंद्रिका सी शीतल है, पर शक्ति रूप भी लेती है।

वही धरती, वही दुर्गा, वही काली का अवतार है,
बिना माँ के सूना लगता, ये सारा संसार है।

महिमा उसकी लिखूँ मैं क्या, वो महादेवी की माया है,
इस सारी दुनिया की धुरी, बस उसकी शीतल छाया है।

उस जैसा नहीं कोई लगती , वह भक्ति है और पूजा है*,
अन्न की देवी, ममता की ज्वाला, माँ जैसा नहीं दूजा है।*

माँ तो घर की धरोहर है, वो संस्कारों का पहिया है,
मेरे सपने भी उसके हैं, वो ही मेरी खिवैया है।

अक्षयपात्र में रखा अमृत भी, माँ के आगे कम पड़ता है,
उसका आशीष मिल जाए तो, भाग्य स्वयं सँवरता है*।

वो जल की निर्मलता है, वो ही इस धरा का है विस्तार ,
सब शब्द कम पड़ जाते हैं, माँ ही तो मेरा है आधार ।*

*शब्दों में बयां करूं क्या उसका*, वो स्वयं एक विधान है,
वो केवल एक शब्द नहीं, वो पूरा एक जहान है।

कवयित्री ज्योती वर्णवाल
नवादा (बिहार)

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