साहित्य

विचारणीय

डॉ अ कीर्ति वर्द्धन

अच्छे भविष्य की चाह में, वर्तमान मत ठुकराइए,
वर्तमान का आनन्द लें, सुखद भविष्य अपनाइए।
है बहुत कुछ महत्व धन का, जग में सबको पता,
धन संग्रह करने की ख़ातिर, यौवन मत गँवाइए।

छूट गये सब रिश्ते नाते, मात पिता भी छूट गये,
भाई बन्धु सखा सभी तो, धन की दौड़ में छूट गये।
खाना पीना समय से सोना, सपने जैसा लगता है,
छोड़ा छाडी के चक्कर में, हम खुद से ही छूट गये।

क्या करोगे धन दौलत का, जीवन में सुख न होगा,
धन तो पास बहुत होगा, तन मन स्वस्थ नहीं होगा।
मख़मल के बिस्तर होंगे, आँखों में नींद नहीं होगी,
औषधि खाकर लेट गये, सपने में सब चिन्तन होगा।

बड़े जतन से धन को जोड़ा, कैसे इसे बर्बाद करें,
नींद गँवाईं- सुख को छोड़ा, कैसे इसे बर्बाद करें।
बड़ा घर बड़ी गाड़ियाँ, बड़े बड़ों में बैठने की चाह,
जिसकी ख़ातिर यौवन भूले, कैसे इसे बर्बाद करें।

डॉ अ कीर्ति वर्द्धन

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