
सावन मनभावन कैसा आया?
पलट गई वसुंधरा की काया।
ओढ़ी है चुनरी देखो हरियाली,
फूलों के गालों पर शर्म की लाली।
मिट्टी की सौंधी सौंधी खुशबू में,
कोयल की मीठी मीठी कूक में।
यादों के बादल मन में है छाये,
ऐसे में कोई साजन को ले आयें।
भीगे मौसम की मीठी मीठी छूअन,
खुश हो रहा है मेरा तन और मन।
रिमझिम बूंदों ने छेड़ी मधुर तरंग,
दिल पर चढ़ रहा है प्रेम का रंग।
प्रकृति मधुर गीत सुना रही है,
ठंडी बयार मन को भा रही है।
मेहंदी रचे हाथ सावन के झूले,
मदमस्त इन दिनों को कभी ना भूले।
सौ, भावना मोहन विधानी ✍️
अमरावती महाराष्ट्र।



