साहित्य

दोहा मुक्तक- क्रोध

डॉ ऋतु अग्रवाल

कभी किसी को क्रोध में, मत देना अभिशाप।
चाहे कितना भी सखे! मन में हो संताप।।
हाय तुम्हारी से भले, मिले उसे दुख घोर-
भोगोगे तुम भी मगर, कटुक शब्द का पाप।।१।

मौन क्रोध का है कवच, जिह्वा का यह खोल।
तनिक ठहर कर सोच तब, मानव कुछ भी बोल।।
पाखंडी संसार यह, करता अर्थ अनर्थ।
इसीलिए निज शब्द को, रखना तू अनमोल।।२।

क्रोध शत्रु है प्रेम का, रिश्ते देता तोड़।
मन बैठा करता रहे, लाभ-हानि के जोड़।।
पावक सम जलता रहे, करे शांति उर भस्म-
शुभ विचार शुचि नीति की, लेता शक्ति निचोड़।।३।

डॉ ऋतु अग्रवाल
मेरठ उत्तर प्रदेश

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