आलेख

“जब ज़ीरो दिया मेरे भारत ने, दुनिया को तब गिनती आई….।”

डॉ. विद्यासागर उपाध्याय

आज आर्यभट जयन्ती है—उस महामनीषी का पुण्य स्मृति-दिवस, जो भारतीय मनीषा में वैज्ञानिक अन्वेषण और तार्किक मेधा के आदि-पुरुष हैं। यह परम विडम्बना है कि आज के बौद्धिक विमर्श केवल आधुनिक संस्थानों की स्थापना के कालखंडों और उनकी राजनीतिक पृष्ठभूमि तक सीमित रह गए हैं, जबकि हम उस युगद्रष्टा को विस्मृत कर बैठे जिसने वैश्विक विज्ञान की आधारशिला पन्द्रह सहस्राब्दी पूर्व ही रख दी थी। पाँचवीं शताब्दी के उस महान् क्रान्तिकारी वैज्ञानिक ने मात्र तेईस वर्ष की अल्पायु में ‘आर्यभटीय’ जैसे कालजयी ग्रन्थ की रचना कर खगोलविज्ञान और गणित की ऐसी स्थापनाएँ दीं, जिन्हें आज का आधुनिक विज्ञान भी पूर्णतः सत्य और प्रामाणिक स्वीकार करता है।
जब सम्पूर्ण विश्व इस अज्ञान के अन्धकार में निमग्न था कि आकाश मण्डल पृथ्वी के चारों ओर परिभ्रमण करता है, तब आर्यभट ने अतीव साहस के साथ उद्घोष किया था कि पृथ्वी अपनी धुरी पर घूर्णन करती है। उन्होंने ‘अनुलोमगतिर्नावस्थः’ जैसे अमर श्लोक के माध्यम से सापेक्ष गति के सिद्धान्त की वह सूक्ष्म और वैज्ञानिक उपमा दी, जहाँ उन्होंने स्पष्ट किया कि जिस प्रकार वेगवती नौका में आसीन मनुष्य को तट के स्थिर वृक्ष विपरीत दिशा में जाते प्रतीत होते हैं, ठीक उसी प्रकार पृथ्वी के घूर्णन के कारण स्थिर नक्षत्र पश्चिम की ओर जाते दिखाई देते हैं। यह वह सत्य था जिसे यूरोप में स्वीकार करने के लिए कोपर्निकस और गैलीलियो जैसे वैज्ञानिकों को सहस्रों वर्षों बाद न केवल संघर्ष करना पड़ा, बल्कि तत्कालीन रूढ़िवादी सत्ता का कोपभाजन भी बनना पड़ा।
गणित के क्षेत्र में आर्यभट की मेधा का कोई सानी नहीं है। उन्होंने वृत्त की परिधि और व्यास के सम्बन्ध को परिभाषित करते हुए पाई का जो सन्निकट मान दिया, वह आज भी विस्मयकारी है। अयुतद्वयविष्कम्भ के माध्यम से उन्होंने दशमलव के चार स्थानों तक जो शुद्धता प्राप्त की, वह उनकी वैज्ञानिक शुचिता का प्रमाण है क्योंकि उन्होंने स्वयं इसे ‘आसन्न’ अर्थात् सन्निकट कहा, जो इस बात का संकेत था कि वे इसके अपरिमेय होने के यथार्थ से भली-भाँति परिचित थे। इतना ही नहीं, आज सम्पूर्ण विश्व जिस त्रिकोणमिति और ‘साइन’ फलन पर आधारित है, उसकी जड़ें आर्यभट की ‘अर्धज्या’ में ही सन्निहित हैं। भारत की ‘जीवा’ और ‘ज्या’ ही अरब से होते हुए यूरोप पहुँची और ‘साइनस’ के रूप में परिष्कृत होकर आधुनिक विज्ञान का मूलाधार बनी।
जिस कालखण्ड में ग्रहण को राहु-केतु जैसे पौराणिक मिथकों के माध्यम से समझा जाता था, वहाँ आर्यभट ने इसे छाया के विज्ञान से निरूपित किया। उन्होंने साक्ष्य प्रस्तुत किया कि चन्द्रमा द्वारा सूर्य का आच्छादन ही सूर्यग्रहण है और पृथ्वी की विशाल छाया का चन्द्रमा पर पड़ना ही चन्द्रग्रहण है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि चन्द्रमा और अन्य ग्रहों का अपना कोई प्रकाश नहीं है, अपितु वे सूर्य की रश्मियों से ही देदीप्यमान होते हैं। कालगणना में उनके द्वारा निर्धारित नक्षत्र वर्ष का मान आधुनिक परिष्कृत उपकरणों द्वारा मापे गए मान से मात्र कुछ मिनटों का अन्तर रखता है, जो बिना किसी आधुनिक यन्त्र के केवल गणितीय सूक्ष्मता से सिद्ध किया गया एक चमत्कारिक तथ्य है।
आर्यभट केवल एक खगोलशास्त्री या गणितज्ञ मात्र नहीं थे, अपितु वे भारत की उस अप्रतिहत मेधा के प्रतिनिधि थे जिसने जड़ता और अन्धविश्वास को तर्क की कसौटी पर चुनौती दी। विज्ञान कभी स्वयं को अन्तिम नहीं कहता, किन्तु जिसने पन्द्रह सौ वर्ष पूर्व अपनी चिन्तन-शक्ति से ब्रह्माण्ड के गूढ़ रहस्यों को अनावृत किया, उसकी स्मृतियों को अक्षुण्ण रखना हमारा सांस्कृतिक और बौद्धिक उत्तरदायित्व है। आज उनकी जयन्ती पर हमें उस वैज्ञानिक दृष्टिकोण को पुनः आत्मसात् करने की आवश्यकता है, जहाँ धर्म और विज्ञान के बीच कोई द्वन्द्व नहीं था, बल्कि सत्य की खोज ही एकमात्र साधना थी। नमन है उस प्रज्ञान-पुरुष को, जिसकी लेखनी से निःसृत ज्ञान आज भी आधुनिक भौतिकी और खगोलशास्त्र को अनुप्राणित कर रहा है।

©® डॉ. विद्यासागर उपाध्याय

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