
चित्र और चरित्र को कह दूँ कैसे समभावी हैं भाई,
मुल्यांकन में यदि तुम चूके तो कैसे होगा भरपाई?
देखा चित्र और चरित्र को पाया दोहरेपन की माया,
होता गंधहीन किंशुक की जैसे मधुरिम दीखे काया।
चतुर खिलाडी़ भावहीन रह,फड़ पर पत्तों को फाँटे,
महके गुलाब हर दिशि अँचल,तोडे़ पर चुभते काँटे।
चित्र खचित रेतों में जल कण ,मृग तृष्णा उपजाते,
अंतस मृग कस्तूरी जैसे हैं ये वन वन को भटकाते।
कहते दर्पण झूठ न बोलें,दर्श कराते हैं जैसा वे पाते,
अपना तलपट खुद ना सोधे जग को हैं बस भरमाते।
✍️चन्द्रगुप्तप्रसाद वर्मा “अकिंचन” गोरखपुर
📞चलभाष ९३०५९८८२५२




