
वृंदावन की गलियों से जब बंसी की धुन थम गई,
यशोदा की आँखों में चुपचाप पीड़ा जम गई।
कान्हा चले मथुरा की ओर, रथ के संग बंधे हुए,
पीछे छूटे गोकुल के दिन, सपनों में जकड़े हुए।
राधा खड़ी थी दूर कहीं, नयन थे पथराए से,
एक नाम ही बचा हृदय में, श्वासों में समाए से।
ना रो सकी, ना कह सकी, बस देखती रह गई,
प्रेम की वो मौन वेदना, भीतर ही बह गई।
मथुरा पहुँचे श्याम जब, कंस का अंत किया,
धर्म की रक्षा के खातिर, हर बंधन को त्याग दिया।
पर उस जीत के पीछे भी, एक टीस छिपी रही,
वृंदावन की हर स्मृति, मन में बसी रही।
राजमहल की चकाचौंध में, मन उनका ना रम पाया,
ग्वालों की वो हँसी, माँ का आँचल याद आया।
सिंहासन भी छोटा लगा, उस प्रेम के आगे,
जो गोकुल में पाया था, निस्वार्थ अनुराग
*अविनाश श्रीवास्तव*
*महराजगंज* । *उत्तर प्रदेश*




